February 16, 2026

First published February 16, 2025

 in Dainik Bhaskar

सिंहासन बत्तीसी से मिली सीख

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एक दिन राजा भोज अपने नगर के निकट एक मैदान से जा रहें थे। वहाँ उन्होंने कुछ अनोखा देखा। अपने सिपाहियों के साथ उस ख़त के पास बढ़ते ही एक किसान चिल्लाया, “दूर रहें, इस खेत से दूर रहें। आपके अश्व मेरी फ़सल को नष्ट कर देंगे। क्या आप मुझ जैसे दीन लोगों पर थोड़ीसी भी दया नहीं करते?” इस चिड़चिड़े किसान के व्यवहार से चकित होकर राजा भोज दूर जाने लगें। लेकिन उनकी पीठ फेरते ही किसान मीठे स्वर में बोलने लगा, “ओ राजा, कहाँ जा रहें हों? आइए, मेरे खत में पधारें। मैं आपके अश्वों को पानी पिलाऊंगा और आपके सिपाहियों को भोजन दूंगा। निश्चित ही आप इस किसान के आतिथ्य को नकारेंगे नहीं।”

राजा भोज किसान को दुःखी नहीं करना चाहते थे। इसलिए, उसके स्वभाव में बदल पर मन ही मन हंसते हुए वे दोबारा खेत की ओर बढ़ने लगें। किसान फिर से चिल्लाया, “आगे न बढ़ें। आपके अश्व मेरी फ़सल को नष्ट कर देंगे। ओ दुष्ट राजा, चले जाएं।” एक बार फिर राजा भोज मुड़ गए। और किसान फिर से बोला, “अरे, आप जा क्यों रहें हैं? लौट आएं। आप मेरे अतिथि हैं। मुझे आपकी सेवा करना का सम्मान दें।”

भोज किसान के व्यवहार के बारे में सोच में पड़ गए। किसान को ध्यानपूर्वक देखने पर वे समझ गए कि जब भी किसान चिल्लाता था तब वह धरती पर खड़ा होता था। लेकिन मैत्रीपूर्ण स्वर में राजा से उसके पास आने का निवेदन करते समय वह खेत के बीच में एक टीले पर खड़ा होता था। भोज समझ गए कि किसान के बदलते व्यवहार और उस टीले में कोई संबंध था। उन्होंने तुरंत अपने सिपाहियों को टीला खोदने का आदेश दिया। स्वभावतः किसान ने उनका विरोध किया। लेकिन भोज ने उसे ध्यान नहीं दिया।

टीले के अंदर एक उत्कृष्ट सुनहरा सिंहासन था। जैसे राजा भोज उसपर बैठने गए, वैसे सिंहासन बोल उठा, “यह महान राजा विक्रमादित्य का सिंहासन है। इसपर केवल तब बैठें यदि आप उनके जितने उदार और ज्ञानी हैं। नहीं तो सिंहासन पर आपकी मृत्यु होगी।” फिर सिंहासन ने भोज को विक्रमादित्य की बत्तीस कहानियां सुनाईं। प्रत्येक कहानी में राजत्व की एक विशेषता पर प्रकाश डाला गया। उदारता सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। इन कहानियों के माध्यम से भोज को समझ आया कि अच्छा राजा बनने के लिए क्या करना पड़ता है।

“सिंहासन बत्तीसी” भारतीय लोकसाहित्य का महत्त्वपूर्ण भाग है। इन कहानियों को बहुधा बच्चों की कहानियां माना जाता है, जो उनका तिरस्कार करने समान है। यह इसलिए कि उनका उद्देश्य सदा से बच्चों का मनोरंजन करना नहीं बल्कि भविष्य के नेताओं के मन को आकार देना था। बच्चों की कहानियों का यह उद्देश्य हम बहुत पहले भूल चुके हैं। और इसलिए बहुत कम लोग कहानी के सबसे रोचक भाग को ध्यान देते हैं – धरती पर किसान असुरक्षित और स्वार्थी है। लेकिन टीले और उसके भीतर के सिंहासन पर खड़े होते ही वह उदार बन जाता है। धरती पर वह साधारण व्यक्ति है जबकि टीले पर वह आदर्श राजा जैसे बन जाता है।

इस कहानी का दूसरा भाग भी उतना ही रोचक है। सिंहासन राजा भोज को उसपर बैठने नहीं देता है। उसकी कई कहानियों के माध्यम से वह राजा से पूछते रहता है कि क्या वे राजा विक्रमादित्य जितने गुणवान और उदार हैं। तो क्या सिंहासन साधारण व्यक्ति को उदार राजा में बदलता है, या क्या किसी व्यक्ति को पहले उदार बनना आवश्यक है ताकि वह सिंहासन पर बैठने योग्य बन सकें? जो भी हो, भारतीय लोकसाहित्य में उदारता राजत्व और फलस्वरूप नेतृत्व की विशेषता प्रतीत होती है।

प्राणी केवल ले सकते हैं, वे कभी देते नहीं हैं। जीवित रहने के लिए वे बलपूर्वक और चतुराई से खाना और आश्रय छीनते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य दूसरों को भोजन और आश्रय दे सकते हैं ताकि वे न केवल जीवित रह सकें बल्कि पनप भी सकें। इस प्रकार, उदारता मनुष्यों तक सीमित है। और जो मनुष्य सबसे अधिक उदार होता है उसे राजा माना जाता है। राजा या नेता अपनी प्रजा के लिए पनपने के अवसर निर्माण करते हैं। हम राजाओं के अस्तित्व का यह मूल कारण बहुधा भूल जाते हैं।

लोग राजाओं और नेताओं को तब याद करते हैं जब वे अपनी प्रजा के हित में कुछ करते हैं। उनसे अपेक्षित होता है कि वे अपनी प्रजा को जीने और पनपने में मदद करें। वे दाता और संरक्षक हैं। जब राजा और नेता अपने आप, अपनी महिमा और अपने वंश के बारे में सोचने लगते हैं, तब वे अपनी प्रजा का ‘उपयोग’ करते हैं। फिर राजा अपने राज्यों के माध्यम से अपनी सत्ता बढ़ाकर भोगी बन जाते हैं। राजा और नेता अपने लिए अवसरों का उपयोग करते हैं और खेत की फ़सल अपनी प्रजा के लिए नहीं बल्कि अपने लिए इकठ्ठा करते हैं।


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