पांचवीं सदी CE में, अर्थात 1500 वर्ष पहले, भारत में गुप्त राजवंश उभरा। गुप्त राज परिवार पहले राज परिवारों में से था जिसने हिंदू धर्म के ढांचे पर आधारित अपने आप को स्स्थापित किया था। गुप्त काल के बाद, रोम के साथ व्यापार अस्त-व्यस्त हुआ, क्योंकि रोमीय साम्राज्य का अंत हुआ था। लेकिन भारत के पूर्वी समुद्रतट से दक्षिणपूर्वी एशिया तक व्यापार पनपा। जहां अब वियतनाम और कंबोडिया राज्य हैं वहां चम्पा और ख्मेर हिंदू राज्य पनपें थे।
चम्पा राज्य तीसरीं से तेरहवीं सदियों तक अस्तित्व में था। वियतनाम के तटवर्ती भागों में, हिंदू त्रिमूर्ति को समर्पित मंदिर पाए जाते हैं। दूसरी ओर, कंबोडिया में कुछ अलग देखा जाता है। कंबोडिया के उत्तरी भीतरी भाग में, कई शिव लिंग पाए जाते हैं। कंबोडिया के दक्षिणी, तटवर्ती भाग में, विष्णु की कई मूर्तियां पाईं जाती हैं। तपस्वियों और अप्सराओं की नक्काशी भी पाई जाती है। इनसे स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में हिंदू विचार पहुंचें थे। इन विचारों में सांसारिक और आध्यात्मिक विश्वों में तनाव देखा जाता है।
इस प्रकार, स्पष्टतया 1500 वर्ष पहले हिंदू विचार भारत से बाहर दक्षिणपूर्वी एशिया तक फैलकर उस क्षेत्र के सबसे दूर भाग, वियतनाम और कंबोडिया में पहुंचें थे।
शिव लिंग एक ज्यामितीय आकृति है न कि मानवीय आकृति। दूसरी ओर, विष्णु की छवियां मानवीय दिखती हैं और उनमें चार भुजाएं होती हैं। शिव लिंग एक स्तंभ जैसे होता था, जो धरती में गाढ़ा जाता था। इसलिए, उसे शिव का लैंगिक चिन्ह माना जाता था। प्रारंभिक शिव लिंगों की तुलना में बाद के शिव लिंग अधिक प्रतीकात्मक हैं: निचला भाग अष्टकोण के आकार का है और ऊपरी भाग गोलाकार है। इससे पता चलता है कि सीमित से असीम तक का प्रवास हो रहा है। शिव लिंग को धरती में गाढ़ा जाता था। इसके माध्यम से राजा उस शिव लिंग के पास के क्षेत्र पर अधिकार जमाते थे।
तटवर्ती भागों में, विष्णु की मूर्तियों में उनकी भुजाएं शंख, चक्र और गदा धारण करती हैं। लेकिन चौथी भुजा में कमल के फूल के बजाय बहुधा एक गोलाकार वस्तु होती है। यह मान्यता है कि यह पृथवी या भूमि है।
विश्व के अन्य भागों से व्यापार करने के कारण कंबोडिया के तटवर्ती क्षेत्र उसके भीतरी क्षेत्रों से अधिक विकसित और परिष्कृत थे। उसके समुद्रतट पर विष्णु पाए जाते हैं जबकि खूंखार और जंगली शिव कंबोडिया के जंगली, भीतरी भागों से जुड़ें हैं। अधिक परिष्कृत विष्णु वस्त्र और आभूषण पहनते हैं। जंगली शिव खाल पहनते हैं और इतने खूंखार होते हैं कि उन्हें केवल प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया जाता है। शिव हर हैं, वे जो अधिकार जमाते हैं। विष्णु हरि हैं, वे जिनसे लाभ होता है। इस प्रकार, राजा हर और हरि दोनों थे। पहले उन्होंने हर जैसे अधिकार जमाया अर्थात उन्होंने वश में किया और फिर हरि की तरह उन्होंने प्रजा को समृद्ध बनाया, जैसे प्राचीन रोमीय साम्राज्य के सरदारों ने किया।
ये छवियां यहां कैसी पहुंचीं? परंपरागत समझ यह है कि सदियों से भारत के पूर्वी समुद्रतट से दक्षिणपूर्वी एशिया तक यात्रा कर रहें समुद्री व्यापारी उन्हें वहां ले गए थे। दक्षिणपूर्वी एशिया में भारतीय वस्त्रों के लिए बड़ी मांग थी। दूसरी ओर दक्षिणपूर्वी मसालों के लिए भारत में नहीं बल्कि उसके पार रोम में बड़ी मांग थी। लेकिन अधिकांश व्यापारी बौद्ध धर्मीय थे। यह स्पष्ट है कि म्यांमार, थाईलैंड और श्री लंका में बौद्ध धर्म उनके कारण फैला। लेकिन इन देशों के पार, वियतनाम और कंबोडिया में हिंदू धर्म फैला। इसका श्रेय पाशुपत शैव नामक विशेष समुदाय को जाता है।
यह समुदाय एक अलग प्रकार की तपश्चर्या करता था। वे जीवन को त्यागने में नहीं बल्कि तपश्चर्या से प्राप्त आध्यात्मिक सिद्ध शक्ति को इकट्ठा कर उसे प्रसारित करने में विश्वास रखते थे। इस प्रकार, देवताओं की यह शक्ति आध्यात्मिक विश्व से मनुष्यों के विश्व तक लाई जा सकती थी। वह साधारण मनुष्य को राजा बनाकर समृद्ध, सुरक्षित और सुखी राज्य स्थापित करने में मदद कर सकती थी। इस समुदाय ने राजा के माध्यम से दैवी और मानवीय विश्वों को जोड़ दिया। स्वभावतः, राजा बनने के इच्छुक शक्तिशाली सरदारों ने उन्हें आमंत्रित किया।
पाशुपत शैवों के साथ पंचरात्र भागवत समाज भी इस क्षेत्र में आया। ये ऋषि थे, जो शिव को नहीं बल्कि विष्णु को, उनके कृष्ण रूप में पूजते थे। शिव और विष्णु की विश्वदृष्टि बहुत अलग थी। शिव अधिक कठोर जीवन जीते थे जबकि विष्णु अधिक सांसारिक जीवन जीते थे। शिव अधिक पौरुष थे जबकि विष्णु अधिक स्त्रैण थे। शिव बल से जुड़ें थे जबकि विष्णु मनाने और कूटनीति से जुड़ें थे।
अगले सप्ताह के लेख में हम जानेंगे कैसे इन दो विश्वदृष्टियों ने दो प्रकार के राज्तवों को जन्म दिया और कैसे उसके बाद उन विश्वदृष्टियों का मिलन हुआ।











