December 14, 2025

First published June 29, 2025

 in Dainik Bhaskar

मन की गांठें खोलने का माध्यम है योग

yoga

योग यह शब्द वैदिक काल का शब्द है। उसका मूल, सबसे सरल अर्थ दो वस्तुओं को जोड़ना था – उदाहरण के तौर पर अश्व को गाड़ी से जोड़ना या बैल को गाड़ी से जोड़ना। स्पष्ट रूप से कहना हो तो योग का अर्थ दो धारणाओं या दो वस्तुओं में संरेखण करना है।

स्वस्थ रहने के लिए किए जाने वाले योग के अभ्यास में भी योग का यही अर्थ होता है। संदर्भ के अनुसार, ये जोड़ विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं। हम मन को शरीर से, श्वास को मन से या मन, श्वास और शरीर तीनों को एक दूसरे से जोड़ सकते हैं। हम किसी व्यक्ति और समाज के बीच के जोड़ को योग कह सकते हैं, या फिर किसी रिश्ते में दो लोगों के बीच के संबंध को योग कह सकते हैं, जैसे पति और पत्नी, माता या पिता और बालक या फिर शिक्षक और छात्र के बीच के संबंध को। धार्मिक संदर्भ में श्रद्धालु और देवता के बीच के संबंध को योग कहा जा सकता है।

योग का अभ्यास हमें हमारे भीतर और बाहर अनुशासन, संरेखण और जोड़ निर्माण करने में मदद करता है। हमारे भीतर हम यह समन्वय शरीर के विभिन्न अंगों में और शरीर की प्रणालियों में निर्माण कर सकते हैं, जबकि हमारे बाहर, हम यह अन्य लोगों और विश्व के साथ, व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर निर्माण कर सकते हैं।

हमें योग की सबसे प्रसिद्ध परिभाषा 2,000 वर्ष पहले लिखे गए योग सूत्र से मिलती है। उसके अनुसार योग चित्त वृत्ति निरोध है अर्थात उससे मन की गांठें खुल जाती हैं। ये वो गांठें हैं जो जीवन में अनुभव किए भय और चिंता के कारण हमारे मन में निर्माण होती हैं।

सैकड़ों हजारों वर्ष पहले हमें जीवित रहने के लिए प्रतिदिन भोजन ढूंढना पड़ता था। यही नहीं तो हमें प्रतिदिन जंगली प्राणियों से बचना पड़ता था। आज, आधुनिक जीवन के तनावों ने इस भय और चिंता की जगह ले ली है। इस कारण, पहले की तरह हम आज भी सदा ‘फ़ाइट, फ़्लाइट या फ़्रीज़’ की अवस्था में जीते हैं और हमारा मन गांठों में बंध जाता है। योग वह अभ्यास है जिससे ये गांठें खुल जाती हैं और हम विश्व के साथ संरेखित बन जाते हैं।

यह संरेखण प्राप्त करने के विभिन्न तरीक़ें हैं। पतंजलि ऋषि उन सभी तरीक़ों को विस्तारपूर्वक, सरल ढंग से संगठित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। पतंजलि के अष्टांग योग के माध्यम से हम बाहर से भीतर तक प्रवास करते हैं। ये आठ अंग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

यम जीवन के सामाजिक पहलुओं से संबंधित है। उसके पालन से हम हमारे आस-पास के लोगों के साथ उचित व्यवहार कर पाते हैं। दूसरी ओर, नियम के पालन से हम अपने आप के जीवन में अनुशासन लाते हैं। इस प्रकार, नियम अत्यंत व्यक्तिगत है। यम हमारे रिश्तों से संबंधित है और नियम अपने आप से संबंधित है। हमारे शरीर से संबंधित आसन का अंग अष्टांग योग का तीसरा और सबसे लोकप्रिय अंग है। प्राणायाम के अंग के माध्यम से हम हमारे श्वास को नियंत्रित करना सीखते हैं।

प्रत्याहार हमारी ज्ञानेंद्रियों से संबंधित है, जिनसे हम बाहरी विश्व से जुड़ते हैं। धारणा के अंग में हम हमारे विचारों के प्रति सजग रहते हैं और उन्हें नियंत्रित किए बिना उन्हें आने और जाने देते हैं। ध्यान में हम हमारा मन किसी एक वस्तु या विचार पर केंद्रित करते हैं, जैसे किसी मंत्र या एक ज्योत या हमारे श्वास पर।

एक स्तर पर, समाधि का अर्थ मन को उस आदिम स्थिति तक ले जाना है जहां उसमें कोई गांठें नहीं होती हैं। कुछ लोगों के अनुसार परमात्मा से जुड़ने से हम समाधि की ओर बढ़ते हैं, जबकि दूसरों के अनुसार विश्व से जुड़ना हमें समाधि की ओर ले जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि समाधि का अर्थ हमारे रिश्तों के साथ गहराई से जुड़ना होता है। दूसरे कहते हैं कि समाधि निसर्ग के साथ जुड़ने से प्राप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए समाधि का अपना अर्थ हो सकता है। लेकिन उसका मूल अर्थ जुड़ना और संरेखण प्राप्त करना होता है।


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