November 28, 2025

First published November 2, 2025

 in Dainik Bhaskar

जानें तमिल नाडु के चोल राजवंश की महिमा, बृहदेश्वर मंदिर और नटराज मूर्ति के माध्यम से

king raja

कुछ साल पहले मणि रत्नम ने चोल राजवंश पर पोन्नियिन सेलवन नामक दो फ़िल्में बनाईं। मैंने पाया कि फ़िल्मों के भव्य पोस्टर, बढ़िया ट्रेलर और समीक्षकों की अत्यधिक प्रशंसा के बावजूद अधिकाँश ग़ैर-तमिल प्रेक्षक इन फ़िल्मों से ऊब गए थे। लेकिन इतने वरिष्ठ निर्माता की फ़िल्मों के बारे में वे यह बात  खुलकर कह न सकें।

मेरी राय में उनके ऊब जाने की वजह बड़ी सरल है। अधिकाँश प्रेक्षक चोल राजवंश के शानदार इतिहास से अपरिचित थे। इसलिए, वे नहीं जानते थे कि कल्कि नामक लेखक ने चोल राजाओं पर सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखें थे, जिनपर ये फ़िल्में आधारित थीं। अतः, इन प्रेक्षकों का फ़िल्मों के प्रति भावनात्मक लगाव बहुत कम था।

शायद ही कोई जानता है कि चोल राजाओं ने हिंदू मंदिरों को मुख्यधरा में लाकर उन्हें राजसी सत्ता का प्रतीक बनाया और हिंदू धर्म का परिदृश्य पूर्णतः बदल दिया।

लगभग 1500 वर्ष पुराने प्रारंभिक हिंदू मंदिर राजाओं द्वारा नहीं बनाए गए थे। ईंटों से बनें ये मंदिर, जैसे 5वीं सदी में कानपूर के निकट भीतरगांव का मंदिर, बौद्ध स्तूपों से प्रेरित और उनकी बराबरी करने हेतु बनाए गए थे। फिर राजा हिंदू मंदिर बनाने लगें और देवताओं की प्रतिमाएं पत्थर की गुफ़ाओं में उकेरी जाने लगीं, जैसे 5वीं सदी में गुप्त राजवंश द्वारा मध्य प्रदेश में उदयगिरि, 7वीं सदी में कलचुरी राजवंश द्वारा मुंबई के निकट एलीफ़ैंटा और दक्खन में बादामी की गुफ़ाओं में।

प्रारंभिक मंदिरों के छत चपटे होते थे। फिर 7वीं सदी में उत्तरी तमिल-भाषी क्षेत्र के पल्लव राजाओं ने महाबलीपुरम में और 8वीं सदी में उत्तरी दक्खन क्षेत्र के राष्ट्रकूट राजाओं ने एल्लोरा में अखण्ड चट्टानों से भव्य कैलाशनाथ मंदिर बनाया। इन मंदिरों के छतों को उत्तर भारत में शिखर और दक्षिण भारत में विमान कहते थे।

फिर 10वीं सदी में चोल राजाओं ने सत्ता धारण की और राजाराज चोल के शासनकाल में बहुत परिवर्तन हुए। उन्होंने उनके दक्षिण में स्थित पांड्य राजाओं और पश्चिम में स्थित चालुक्य राजाओं जैसे प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया। इसके बाद उन्होंने आंध्र और ओडिशा के समुद्रतट से होते हुए बंगाल में गंगा की नदीमुख भूमि तक का संपूर्ण क्षेत्र अपने वश में कर लिया। वहाँ से उन्होंने भैरव की मूर्तियां लूटकर दक्षिण के मंदिरों में प्रतिष्ठापित की।

उन्होंने श्री लंका को भी वश में कर लिया। फिर उन्होंने तमिल व्यापारी जहाज़ों की मदद से इंडोनेशिया के श्रीविजय राजाओं के विरुद्ध समुद्री युद्ध लड़ा और दक्षिण-पूर्वी एशिया तक के व्यापारी मार्गों को अपने नियंत्रण में कर लिया।

राजाराज चोल ने तंजावुर में बृहदेश्वर मंदिर निर्माण किया, जो उस समय के सबसे भव्य मुक्त-खड़े मंदिरों में से एक था। द्रविडियाई शैली के इस मंदिर का पिरामिडनुमा विमान 200 फ़ुट से अधिक ऊंचा है। इस मंदिर में शिव प्रतिष्ठापित हैं और चूँकि राजाराज ने इस मंदिर का निर्माण किया था, इसलिए इस देवता को राजाराजेश्वर कहा जाता है।

यह भी मान्यता थी कि राजा शिव का रूप होता है। चोल राजाओं ने उस स्थान पर शिव मंदिर बनाएं जहाँ किसी राजा का दहन या दफ़न हुआ था। इस प्रकार, राजा का देवत्व के साथ घनिष्ठ संबंध निर्माण होता था। देवताओं के माध्यम से राजा और राजसी सत्ता को वैधता मिली, विशेषकर 10वीं और 12वीं सदियों के बीच। और जैसे राष्ट्रकूट, कलचुरी और चालुक्य राजवंशों ने एल्लोरा तथा एलीफ़ैंटा में शिव को समर्पित मंदिर बनाए वैसे चोल राजवंश के लिए भी शिव प्रमुख देवता थे।

कई सदियों पहले, गुप्त राजाओं के लिए विष्णु सबसे महत्त्वपूर्ण देवता थे। इसलिए, उन्होंने मध्य भारत के पहाड़ों में विष्णु के वराह अवतार की विशाल प्रतिमाएं बनाईं थीं, जिनमें वराह भू-देवी को अपने थूथन पर उठाकर दानवों से बचाते हुए दिखाए गए। अपने विशाल मंदिरों के माध्यम से चोल राजा दिखा रहें थे कि वे पहले के राजाओं से श्रेष्ठ थे।

राजा प्रतिस्पर्धी होते हैं। और इसलिए, राजाराज चोल के बेटों और पोतों सहित अन्य राजाओं ने अधिक ऊंचे और भव्य मंदिर बनाए।

ओडिशा में अनंतवर्मन चोडगंग, ने बृहदेश्वर से ऊंचा मंदिर बनाने के हेतु से पूरी का जगन्नाथ मंदिर बनाया। लेकिन उसका शिखर बृहदेश्वर के विमान से थोड़ा छोटा निकला। इसलिए, धातु के बने एक विशाल ‘चक्र’ को शिखर पर रखकर वह बृहदेश्वर से ऊंचा बन गया।

मालवा के परमार राजवंश के राजा भोज ने 11वीं सदी में भोपाल में शिव को समर्पित भव्य मंदिर बनाना चाहा। इस मंदिर में सात फ़ुट ऊंचा शिव-लिंग होने वाला था। लेकिन मंदिर अधूरा रह गया। कुछ लोगों का मानना है कि यह किसी प्राकृतिक विपत्ति के कारण हुआ, या उसके वास्तु शास्त्र में कोई कमी थी। कुछ अन्य लोग मानते हैं कि चालुक्य राजाओं के हाथों राजा भोज के पराजय के पश्चात इस मंदिर का निर्माण रुक गया। खजुराहो के मंदिरों के पीछे भी ऐसी ही राजसी महत्त्वाकांक्षा है।

भव्य हिंदू मंदिर को राजसी सत्ता का चिन्ह बनाने का श्रेय चोल राजाओं को जाता है। उन्होंने अपने साधन और ज्ञान से विशाल मुक्त-खड़ा बृहदेश्वर मंदिर बनाया, जिसका ऊंचा, गगनचुंबी विमान मीलों दूर से दिखाई देता था। आज जो गोपुरम नामक प्रवेश-द्वार दक्षिण भारतीय मंदिरों से जोड़ें जाते हैं वे भी उनका आविष्कार थे। बाद के राजाओं ने प्रतिस्पर्धा करने के हेतु से और ऊंचे तथा भव्य गोपुरम बनाए।

भारत में इतने भव्य मंदिर पहले कभी नहीं बनाए गए थे। मंदिर छोटे हुआ करते थे, और वे बहुधा गुफ़ाओं में होते थे, बिना किसी छत के या फिर वे लकड़ी या ईंट के बने होते थे। चोल राजवंश से पहले सबसे भव्य मंदिर कश्मीर और ओडिशा में तथा दक्षिण भारत में पल्लव और चालुक्य राजवंशों द्वारा चट्टानों में बनाए मंदिर थे। लेकिन ये मंदिर बृहदेश्वर के मंदिर जितने विशाल नहीं थे।

रूढ़िवादी ब्राह्मण समुदाय को वैदिक अनुष्ठान करना पसंद था, जिन अनुष्ठानों का मूर्तियों तथा प्रतिमाओं से कोई लेना-देना नहीं था। जबकि राष्ट्रवादी इस बात का प्रचार करते हैं कि हिंदू मंदिर वैदिक काल से रहें हैं, इतिहासकारों के अनुसार रूढ़िवादी धर्म-शास्त्रों में मंदिरों का उल्लेख 12वीं सदी के बाद ही होने लगा। यह वो समय था जब उत्तर भारत में मंदिरों को तोड़कर भव्य मस्जिद बनाए जा रहें थे। संभवतः यह कोई संयोग की बात नहीं है कि चोल मंदिर उसी सदी में बनाए जाने लगें जिस सदी में महमूद ग़ज़नवी ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर पर पहला छापा मारा।

चोल राजा अपने शिव मंदिरों के कारण प्रसिद्ध बनें, जिनमेंसे बृहदेश्वर, गंगईकोंड चोलपुरम और ऐरावतेश्वर जैसे मंदिरों को यूनेस्को टैग भी मिले हैं।

लकड़ी और ईंटों से बने राजमहल के विपरीत पत्थर के बने ये मंदिर आज तक टिकें हैं। चोल राजवंश द्वारा चिदंबरम में बनाया गया नटराज मंदिर, उन प्रारंभिक हिंदू मंदिरों में से है जो आज भी सक्रीय है और जो नर्तकों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

आज विश्वभर के संग्रहालयों में नटराज और अन्य कांस्य मूर्तियां पाईं जाती हैं। ये मूर्तियां चोल राजाओं के शासनकाल में ही बनाईं गईं। चोल राजाओं के बारे में ये बातें शायद उन्हें आम भारतीयों के और निकट लाए, न कि पोन्नियिन सेल्वन में दिखाई गई राजनीति।


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