January 28, 2026

First published April 27, 2025

 in Dainik Bhaskar

जैन धर्म की संरक्षक यक्षियाँ

jain

जैन धर्म मठवासी धर्म है। इतिहासकारों के अनुसार उसका उगम 2,500 वर्ष पहले हुआ और उसके अधिकाँश धर्मग्रंथ 1,500 वर्ष पहले रचें गए। लेकिन उसके आख्यानशास्त्र के अनुसार वह एक सनातन धर्म है अर्थात वह अनादि और अनंत है। उसके अनुसार समय के अनगिनत कालचक्र होते हैं और प्रत्येक कालचक्र में 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती और 9 वासुदेव धरती पर जन्म लेकर जैन धर्म का प्रचार करते हैं। जैन धर्म पर बात करते समय बहुधा तीर्थंकरों के पुरुष और महिला सेवकों अर्थात यक्ष और यक्षियों का उल्लेख करना रह जाता है। महिला यक्षों को यक्षिनी भी कहा जाता है। चौबीस तीर्थंकर होने के कारण विस्तृत जैन देवगण में कुल चौबीस यक्ष और चौबीस यक्षियां भी होती हैं।

जैन विश्व दो समूहों में बंटा हुआ था। श्रमण वे साधू थे जिन्होंने भूख को वश में करना चाहा। उनके लिए तीर्थंकर आदर्श थे, जिन्होंने विश्व में भूख सहित अन्य सभी कुछ त्याग दिया था। दूसरी ओर, श्रावक इन श्रमणों का समर्थन करते थे। वे मामूली व्यवसायी और व्यापारी थे और उनकी सादी, सांसारिक आवश्यकताएं होती थी।

तीर्थंकरों को पूजने के साथ-साथ ये श्रावक क्षेत्रीय देवी-देवताओं को भी पूजते थे। ये देवी-देवता पहाड़ों, पेड़ों, चट्टानों और नदियों से जुड़ें होते थे। समय के साथ वे तीर्थंकरों के साथ जोड़े जाने वाले यक्ष और यक्षी बन गए। इस प्रकार, सामान्य लोगों का देशी धर्म जैन मठवासी संप्रदाय के मार्गी धर्म से जुड़ गया।

यक्ष और यक्षियां प्राचीन क्षेत्रीय देवी-देवता थे जो परोपकारी और द्वेषपूर्ण दोनों थे। ऐसी कई कहानियां मिली हैं जिनमें यक्ष और यक्षियों ने साधुओं और ऋषियों को कष्ट पहुंचाए। कुछ को दूर भगाया जाना पड़ा, कुछ को वश में कर लिया गया और कुछ को मनाया गया जिससे वे जैन साधुओं की सेवा करने लगें। इसके बाद साधु और उनका धर्म लोकप्रिय बन गए। संभवतः इससे गांव वाले तीर्थंकरों और उनके साथ यक्ष और यक्षियों को पूजने के लिए प्रेरित हुए।

कुछ जैन यक्षियां हिंदू देवियों से मिलती-जुलती हैं। उदाहरणार्थ, बाईसवें तीर्थंकर, नेमिनाथ, की यक्षिनी, अंबिका, दुर्गा की तरह शेर पर सवार होती हैं। अंबिका को अंबाई, अंबा और  कुष्मंण्डिनी भी कहा जाता है। वे बच्चों से जुड़ीं हैं और इसलिए हम उन्हें पारवती से जोड़ सकते हैं। अंबिका को समर्पित कई मंदिर और उनकी कई मूर्तियां भारतभर पाईं जाती हैं। कुष्मंण्डिनी देवी की पूजा कर्नाटक में श्रवणबेलगोल के अनुष्ठानों का एक महत्त्वपूर्ण भाग है।

तेईसवें तीर्थंकर, पार्श्वनाथ, की यक्षिनी, पद्मावती, नागों और कमल के फूल से जुड़ीं हैं। इसलिए, हम उन्हें लक्ष्मी और गोवा में प्रसिद्ध सतावई और ब्राह्मणी जैसी धरती की देवियों से जोड़ सकते हैं। अंबिका की तरह, पद्मावती को भी पूजा जाता है। वास्तव में, दोनों तांत्रिक अनुष्ठानों से जुड़ीं हैं। भैरव-पद्मावती-कल्प पद्मावती के सम्मान में मल्लीसेन द्वारा 12वीं सदी में लिखा तांत्रिक ग्रंथ है।

इस कालचक्र में पहले तीर्थंकर, ऋषभनाथ, चक्रेश्वरी से जुड़ें हैं, वे देवी जो कृष्ण की तरह चक्र धारण करती हैं।

विद्या की देवी, सरस्वती, का जैन चित्रकारी में प्रमुख स्थान है, क्योंकि वे ऋषियों के ज्ञान का मूर्त रूप हैं। यह संभव है कि उनका भी उगम एक यक्षी के रूप में हुआ। उनकी सबसे प्राचीन छवि मथुरा मे सन 100CE तक कालांकित जैन पुरातत्त्व स्थल में पाई जाती है। जैन धर्म के अधिक कठोर दिगंबर संप्रदाय में सरस्वती मोर के साथ जुड़ीं हैं। श्वेतांबर संप्रदाय में वे हंस से जुड़ीं हैं। उन्हें संगीत, कला, लेखन और लिपियों से जोड़ा जाता है। उन्हें श्रुति देवी (वाणी की देवी) के नाम से भी जाना जाता है। संभवतः इससे पहले कि सरस्वती हिंदू देवगण की महत्त्वपूर्ण देवी बन गईं, उनका चित्रीकरण जैन देवगण में और लोकप्रिय था।

एक और यक्षिनी जो विशेषकर दक्षिण भारत में लोकप्रिय बनी वे थी ज्वालामालिनी। उनकी माला अग्नि से बनी होती थी। वह 750CE और 1,000CE के बीच कर्णाटक में राष्ट्रकूट युग में प्रसिद्ध थी। वे आठवें तीर्थंकर, चंद्रप्रभा, से जुड़ीं हैं। जैन आचार्य इंद्रनंदी ने उनके सम्मान में दसवीं सदी में कर्नाटक में ज्वालामालिनी कल्प रचा।

इन देवियों का आवाहन समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है। बहुधा उनकी कई भुजाएं होती हैं। उनके माध्यम से हम देख सकते हैं कैसे न केवल जैन देवगण में बल्कि महायान बौद्ध धर्म और पौराणिक हिंदू देवगणों में देवियों का महत्त्व बढ़ रहा था।


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