February 7, 2026

First published March 23, 2025

 in Dainik Bhaskar

शूर्पणखा पर कुछ बातें

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आज हम रावण की बहन, शूर्पणखा, के माध्यम से उनके चरित्र के कुछ पहलू समझेंगे।

रामायण प्रकृति और संस्कृति के बीच भेद करती है। प्रकृति में मत्स्य न्याय लागू होता है और नियम तथा न्याय की धारणाएँ नहीं होती हैं। यहाँ कोई किसी का पोषण नहीं करता है। लेकिन मनुष्य मत्स्य न्याय के पार जाकर एक दूसरे की सहायता और पोषण कर संस्कृति स्थापित कर सकते हैं।

रामायण में वन की निवासी शूर्पणखा के माध्यम से प्रकृति और संस्कृति में भेद समझाया गया। वे वन में स्वतंत्र जीवन जीती थीं। दूसरी ओर उनके भाई रावण उनकी सहायता करते थे। इस प्रकार, वे संस्कृति और प्रकृति के दायरे पर थीं।

शूर्पणखा के पति

शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह भी एक राक्षस थे। रावण और विद्युतजिव्ह के बीच लड़ाई की कई कहानियां हैं। दक्षिण-पूर्वी एशियाई रामायणों के अनुसार अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान रावण ने पाया कि एक राक्षस ने पाताललोक को अपनी विशाल जीभ से ढककर उसे रावण से सुरक्षित रखा था। रावण ने बाण से जीभ को नष्ट किया, यह न जानते हुए कि वह जीभ उनके बहनोई की थी। इस प्रकार, विद्युतजिव्ह अनिच्छापूर्वक मारे गए। दूसरी कहानी के अनुसार, दोनों में मतभेद के कारण उनमें लड़ाई हुई और विद्युतजिव्ह मारे गए।

दक्षिण भारत की एक रोचक लोककथा के अनुसार शूर्पणखा और मंदोदरी के बीच हुए झगड़े के कारण रावण और विद्युतजिव्ह में लड़ाई हुई। विद्युतजिव्ह ने अपनी लंबी जीभ से रावण को फँसाकर उन्हें निगल लिया। तब रावण ने उनके पेट के भीतर से शूर्पणखा से विद्युतजिव्ह का पेट चीरकर उन्हें बचाने की भीख माँगी। शूर्पणखा अपने पति को मारना नहीं चाहती थी। तब रावण ने उन्हें लालच दिया कि यदि शूर्पणखा उन्हें बचाएँगी तो रावण शूर्पणखा के पुत्र को लंका का राजा बनाएँगे।

शूर्पणखा ने रावण पर विश्वास किया और अपने हाथों से अपने पति का पेट चीरकर उन्हें मार डाला और रावण को बचाया। यह लोककथा बहुत प्रसिद्ध नहीं है। छाया कठपुतलीकारों में और दक्षिण भारत में इस घटना से जुड़ी कई कहानियाँ हैं।

फिर कहानी ने एक रोचक मोड़ लिया। रावण ने शूर्पणखा के विधवापन के लिए उत्तरदायित्व स्वीकारते हुए उन्हें दंडकारण्य में घूमने और वहाँ अपनी पसंद के किसी भी पुरुष से संबंध रखने की पूरी सहमति दी। इस दिलचस्प बात को हमें ध्यान में रखना होगा।

शूर्पणखा का प्रतिशोध

रामायण के विभिन्न वृत्तांतों में शूर्पणखा के पुत्र के भिन्न नाम हैं, जैसे शंबीरी, शंबकुमार और जांबुलकुमार। अपनी माँ को मिले वचन के कारण शंबीरी को लगा कि वे लंका के राजा बनाए जाएँगे। लेकिन इंद्रजीत ने उनका भ्रम दूर करते हुए कहा कि रावण ने उनकी माँ को झूठा वचन दिया था। और चूँकि वे अमर थे इसलिए वे सदा लंकापति बने रहेंगे। इससे शंबीरी को बहुत बुरा लगा और उन्होंने यह बात शूर्पणखा को बताई।

तब शूर्पणखा ने विद्युतजिव्ह की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। उन्हें याद आया कि ब्रह्मा से मिले वर के कारण कोई पशु, पक्षी, यक्ष, देवता, असुर, विद्याधर और वानर रावण का वध नहीं कर सकता था। इसलिए, वे एक ऐसे मनुष्य को ढूँढ़ने निकलीं जो रावण का वध कर सके।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार वन में शूर्पणखा और राम का मिलन मात्र एक संयोग था। लेकिन इस लोककथा के अनुसार यह चाणक्य रुपी शूर्पणखा द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र था।

इस दंतकथा को कितना महत्त्व देना है, मुझे नहीं पता। मैं कहानी में निहित ज्ञान और उसके उद्देश्य पर ध्यान देता हूँ, न कि कहानी की सत्यता पर। इस कहानी से यथासंभव रावण का चरित्र समझाया जा रहा है। इसका महत्त्व हम बाद में देखेंगे।

राम और लक्ष्मण से मिलन

शूर्पणखा की ओर लौटते हैं। वे स्वायत्त, वन की कन्या थीं, जो विधवा थीं और अपनी इच्छानुसार पुरुषों के साथ संबंध रखने के लिए मुक्त थीं। एक दिन वन में वे राम से मिलीं। राम की सुंदरता से कामुक होकर उन्होंने उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन राम ने उन्हें यह कहकर नकारा कि वे सीता से विवाहित थे। यह सुनकर शूर्पणखा को ईर्ष्या महसूस हुई और क्रोध भी आया।

फिर राम ने यह सोचकर उन्हें लक्ष्मण से मिलने कहा कि वे संभवतः शूर्पणखा में रुचि लेंगे। लेकिन लक्ष्मण ने भी उन्हें नकारा, क्योंकि राम और सीता की सेवा करना उनका एकमात्र उद्देश्य था और वे भी विवाहित थे। इस प्रकार, राम और लक्ष्मण दोनों ने शूर्पणखा को सम्मति नहीं दी।

शूर्पणखा की राक्षस बुद्धि

लेकिन शूर्पणखा ठहरी राक्षसी, जो अपनी पशु प्रवृत्ति के पार नहीं जा पाईं थी। अनुमति की धारणा उनकी समझ के बाहर थी। वे केवल हड़पने की आदी थीं, और यह प्रवृत्ति जंगली और असभ्य थी।

वे राम को बलपूर्वक पाना चाहती थीं और इसलिए उन्होंने यह सोचकर सीता पर आक्रमण किया कि यदि उनकी मृत्यु हुई तो राम और लक्ष्मण उनके साथ आ जाएँगे। यह राक्षस बुद्धि थी। सीता को बचाने के प्रयास में लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी। कुछ रामायणों के अनुसार, उन्होंने शूर्पणखा के स्तन भी काट दिए।

कलह के बीज

रामायण में स्त्री के विरुद्ध यह हिंसक घटना निर्णायक थी। उससे बोए बीज का फल विषैला था। उसके पश्चात रामायण से माधुर्य और श्रृंगार रस चले गए और उसमें वीभत्स तथा रौद्र रस आ गए।

शूर्पणखा इस अन्याय से अत्यंत क्रोधित हुईं। उनके कहने पर उनके भाइयों खर और दूषण ने राम और लक्ष्मण पर वार किया। उनमें हुए युद्ध में खर, दूषण और अन्य राक्षस मारे गए।

रावण को उकसाना

इसलिए, शूर्पणखा ने लंका जाकर रावण को वन में हुईं घटनाओं का वर्णन दिया। उन्होंने बताया कि शूर्पणखा पर वार रावण पर वार के बराबर था। उन्होंने रावण को याद दिलाया कि इन्हीं युवकों ने कई वर्ष पहले विश्वामित्र के यज्ञ के समय ताटक, मारीच और सुबाहु राक्षसों का वध किया था। इन बातों से शूर्पणखा ने रावण में भय निर्माण कर उन्हें उकसाया भी।

अचानक रावण को लगा कि लंका को इन युवकों से जोखिम थी। वे उनसे इसलिए घबरा गए कि ब्रह्मा से अमरत्व का वर माँगते समय वे मनुष्यों का उल्लेख करना भूलगए थे। राम विष्णु के अवतार थे, पर वे इसके बारे में अनभिज्ञ थे।

शूर्पणखा रावण के स्वार्थी स्वभाव से भी भली भांति परिचित थीं। जिस भाई ने अपनी बहन को विधवा बनाया था वह उसे न्याय दिलाने के लिए क्यों लड़ाई करता? इसलिए, शूर्पणखा ने 

एक चाल चली। उन्हें पता था कि रावण को सुंदर स्त्रियां अच्छी लगती थीं, इसलिए उन्होंने रावण से सीता की सुंदरता का वर्णन किया। जैसे अपेक्षित था वैसे ही रावण सीता की सुंदरता से कामुक हुए और उन्होंने उनका भोग करना चाहा। अपनी बहन को न्याय दिलाने का झूठा कारण देकर उन्होंने सीता का अपहरण किया। इससे हम रावण चरित्र समझ सकते हैं।

साभार: ‘लंकेश – रावण संग एक रोमांचक यात्रा’, पेंगुइन स्वदेश।


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