February 15, 2026

First published February 23, 2025

 in Dainik Bhaskar

शिव की तीसरी आँख का महत्त्व

Shiva third eye andhaka anger

शिव की ललाट के केंद्र में स्थित उनकी तीसरी आँख ने हमेशा से ही लोगों को मोहित किया है। कई लोग मानते हैं कि इसी आँख के कारण शिव को ‘विनाशक’ कहा जाता है। यह मान्यता भी है कि शिव क्रोधित होने पर यह आँख खोलते हैं, जैसे जब उन्हें उनकी पत्नी, सती, की मृत्यु का पता चला था।

लेकिन शिव की कथाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ने से कुछ अलग ही पता चलता है। सती के पिता, दक्ष, ने शिव को छोड़ उनके अन्य सभी जमाइयों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया था। सती शिव को किया यह अपमान सहन नहीं कर पाईं। इसलिए, उन्होंने यज्ञ वेदी में छलांग मारकर आत्महत्या कर ली। जब शिव को यह पता चला तब उन्होंने क्रोध और विलाप दोनों अनुभव किए। वे वीरभद्र में बदल गए और यज्ञ शाला में उपस्थित सभी का विनाश किया। दक्ष को शिरश्छेदित करने पर उनके क्रोध का अंत हुआ।

फिर वे सती की लाश लिए उनका विलाप करते हुए विश्वभर घूमने लगें। उनका विलाप केवल तब थम गया जब देवताओं ने सती की लाश को कई टुकड़ों में चीर दिया। तपस्वी होने के कारण शिव सांसारिक विश्व को त्यागकर हिमालय के पहाड़ों पर लौट गए और अपने क्रोध और पीड़ा से मुक्त हो गए।

लेकिन रोचक बात यह है कि प्रेम और प्रतिशोध से भरी इस कहानी में शिव की तीसरी आँख का कोई उल्लेख नहीं है।

सती ने पारवती के रूप में पुनर्जन्म लिया। वे शिव को देखकर उनके प्रेम में पड़ गईं और उनका ध्यान  आकर्षित करने के बहुत प्रयास किए। लेकिन शिव पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। इससे सती सहित देवगण भी उतावले हो गए क्योंकि वे चाहते थे कि शिव का विवाह हो।

तब देवों ने कामदेव से मदद मांगी। कामदेव ने ईख का बना धनुष उठाया और मधुमक्खियों से बना प्रत्यंचा खींचकर फूलों से बनें इच्छा के बाण शिव की ओर छोड़ें। लेकिन इसका शिव पर अलग ही प्रभाव हुआ। उन्होंने अपनी आँखें खोलकर पारवती के प्रति अपनी इच्छा व्यक्त करने के बजाए अपनी तीसरी आँख खोलकर कामदेव को जलाकर राख कर दिया। और तबसे शिव को विनाशक कहा जाने लगा।

यह इसलिए कि कामदेव के वध से शिव ने न केवल इच्छा को नष्ट किया बल्कि संपूर्ण विश्व को जीवित रखने वाले सिद्धांत को भी नष्ट किया। इच्छा के न होते हुए न कोई निषेचन होगा और न ही कोई प्रजनन होगा। इस प्रकार, जीवन नहीं होगा और विश्व बंजर बन जाएगा।

देवता समझ गए कि शिव कामवासना से प्रभावित नहीं होंगे। इसलिए, उन्होंने पारवती से मदद मांगी। पारवती स्वयं शक्ति थी, शिव की स्त्रैण प्रतिरूप, जो उन्हें पूर्ण बनाती थी। यदि शिव कामदेव को नकारते थे तो पारवती कामदेव को स्वीकारकर उन्हें मनाती थी। पारवती ने निश्चय किया कि वे शिव को संन्यासी से गृहस्थ में बदलेंगी ताकि वे विश्व में कामवासना और इच्छा का महत्त्व समझ सकें।

पारवती ने स्थिर बैठकर अपनी आँखें बंद कर ली और इतनी एकाग्रता से शिव के बारे में सोचने लगीं कि शिव उन्हें वरदान देने में विवश हो गए। पारवती ने शिव से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की और शिव को मानना पड़ा। इस प्रकार, शक्ति ने याचना के माध्यम से अपनी इच्छा पूरी करने का निश्चय प्रदर्शित किया और इच्छा के विनाशक, शिव, को भी उनकी इच्छा पूरी करनी पड़ी।

शिव और शक्ति का विवाह एक महत्त्वपूर्ण घटना है क्योंकि उससे इच्छा को नकारने वाले शिव इच्छा को मनाने वाली शक्ति के साथ जुड़ जाते हैं। इस प्रकार, उर्वरता और भौतिकवाद को नकारने वाले मठवासी संप्रदाय को स्वीकार करना पड़ता है कि सांसारिक विश्व में उर्वरता और भौतिक वस्तुओं का होना भी महत्त्वपूर्ण है। उससे संतुलन बना रहता है।

शिव की तीसरी आँख इच्छा को नकारने की प्रतीक है। शिव इच्छा को इसलिए नकारते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि इच्छा के क्या परिणाम हो सकते हैं – वांछित वस्तु या व्यक्ति (सती) के चले जाने पर बहुत पीड़ा और क्रोध का अनुभव होता है। इस प्रकार, इच्छा से न केवल सकारात्मक भावनाएं बल्कि नकारात्मक भावनाएं भी उत्पन्न होती हैं। इसलिए, शिव कैलाश पर्वत पर इच्छा से दूर, आनंदित रहते हैं।

एक दिन, पारवती ने खेल-खेल में शिव की दो आँखों को ढक लिया। इससे विश्व में अंधकार हो गया क्योंकि शिव की आँखों से उसमें रौशनी होती थी। इसलिए, शिव ने अपनी तीसरी आँख खोलकर फिर से रौशनी कर दी। तीसरी आँख की उष्णता से पारवती के हाथों से स्वेद निकला। शक्ति के स्वेद और शिव की उष्णता से अंधक नामक बालक निर्माण हुआ। उसे शिव के एक निस्संतान असुर भक्त को दिया गया। बड़ा होते समय उसे अपने जन्म की कहानी पता नहीं थी।

नौजवान बनने पर उसने तपस्या करके अमरत्व का वरदान प्राप्त किया। इस वरदान के अनुसार वह केवल तब अपने पिता के हाथों मारा जाता जब वह अपनी माँ के प्रति कामवासना का अनुभव करता। इस वरदान की मदद से उसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की। इस बीच उसने पारवती को देखा। उनकी सुंदरता से कामोत्तेजित होकर उसने पारवती को अपनी रानी बनाना चाहा। जब उसने इस उद्देश्य से पारवती का पीछा किया तब शिव ने पारवती को बचाकर अंधक पर अपने त्रिशूल से वार किया। अंधक के शरीर से रक्त निकलते समय उसे अपने जन्म की सच्चाई पता चल गई और उसने पारवती से क्षमा मांगी।

यह कहानी तीसरी आँख का बुरा पहलु प्रस्तुत करती है। इच्छा के विनाश से सभी विभाजन नष्ट हो जाते हैं। हम सांसारिक विभाजनों, भेदभाव और वर्गीकरण से ऊपर उठते हैं। लेकिन, इस कहानी के अनुसार इस आनंदित स्थिति में हम सांसारिक वास्तविकताएं भूलकर अंधे हो जाते हैं, जैसे अंधक था। इसलिए, जबकि संन्यासी शिव की तीसरी आँख के गुण गाते हैं, गृहस्थ उनकी बाईं और दाईं आँखें पसंद करते हैं, जो सांसारिक इच्छाओं और उचित व्यवहार का महत्त्व समझते हैं।


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