November 30, 2025

First published November 9, 2025

 in Dainik Bhaskar

बौद्ध जातक कथाओं, बाइबल इत्यादि से जानें इतिहास में व्यापारियों का योगदान क्या रहा

Buddha

अधिकांश ऐतिहासिक कहानियों में राजा और उनके द्वारा लड़ें गए युद्धों का वर्णन होता है। यह इसलिए कि इतिहास का विषय औपचारिक ढंग से 19वीं सदी में विकसित हुआ, जिस समय के राजा अपने पूर्वजों के पराक्रमों के बारे में जानने के इच्छुक थे। इसलिए, इतिहासकारों ने भी साम्राज्यों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। यदि यूरोप पर व्यापारी वर्ग का वर्चस्व रहा होता, तो हमें कहानियों के माध्यम से उनके इतिहास पर अधिक जानकारी मिली होती। अब इतिहासकार जान रहें हैं कि इतिहास में राजाओं के बारे में जानने के अलावा भी बहुत कुछ जानने जैसा है और इसलिए व्यापारी वर्ग की कहानियां भी सामने आ रहीं हैं।

आख्यानों पर भी यही लागू होता है, जो राजा, पुजारी और ऋषियों की न कि व्यापारियों की कहानियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन व्यापारी वर्ग पर ध्यान केंद्रित करने पर हम पाएंगे कि विशेष रूप से स्थानीय लोकसाहित्य में इस वर्ग के साथ बड़ी रोचक कहानियाँ जुड़ीं हैं।

एक लोककथा, जो इतनी विख्यात नहीं है, वह अग्रवाल समुदाय से जुड़ी है। एक बार, महाराजा अग्रसेन, ने व्यापारियों का नगर स्थापित कर जगह-जगह के वरिष्ठ व्यवसायियों को उसमें बसने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने निर्धारित किया कि नगर का हर परिवार प्रत्येक नए व्यवसायी को एक ईंट और एक सुनहरा सिक्का देगा, ताकि उस व्यवसायी को वहाँ बसने के लिए प्रोत्साहन मिल सकें। इस प्रकार, प्रत्येक व्यवसायी के पास ईंटें और सिक्कें इकठ्ठा हो जाते थे, जिनसे वह क्रमशः नया घर और व्यवसाय शुरू कर सकता था। यदि उसका व्यवसाय सफल होता तो वह नगर वासियों के प्रति सदैव आभारी रहता। इस प्रकार, राजा अग्रसेन द्वारा स्थापित इस नगर में विश्वभर से लोग रहने आए।

केरल के लोकसाहित्य में उप्पुकोट्टन का उल्लेख है, जो संभवतः यहूदी या मुसलमान व्यापारी था। वह इतना निपुण था कि वह नमक निर्माताओं को नमक और रूई निर्माताओं को रूई तक बेच सकता था। यह कथा पराई पेट्टा पंथिरुकुलम नामक कथा संग्रह में पाई जाती है, जिसमें एक ब्राह्मण पिता और एक दलित माता की बारह संतानों की विशेषताएं वर्णित हैं, जिन संतानों का विभिन्न समुदायों ने पोषण किया था। इस प्रकार, इस संग्रह के माध्यम से जाति वर्गीकरण की धारणा को चुनौती दी गई।

बौद्ध जातक कथाओं में भी व्यापारियों की कई कहानियाँ हैं। अपण्ण जातक में वर्णित है कैसे एक चतुर व्यापारी रेगिस्तान की लंबी यात्रा पर पर्याप्त मात्रा में पानी ले गया। उसने यह अपने प्रतिद्वंद्वी के आग्रह के बावजूद किया, जो चाहता था कि उसकी रेगिस्तान में प्यास से मृत्यु हो जाए। वन्नुपत्थ जातक में वर्णित व्यापारी कई बाधाओं के बावजूद पानी ढूंढ लेता था। सेरिवाणिज्य जातक में अनैतिक व्यापारियों का उल्लेख है जो वस्तुओं का दाम घटाकर मुनाफ़ा कमाते थे। चुल्ल-सेट्ठी जातक में वर्णित व्यापारी जान गया था कि मांग बढ़ने पर उसका व्यवसाय भी बढ़ता और इसलिए उसने हर स्थिति में लोगों का शोषण किया। तांदुलनलि जातक में वस्तुओं का मूल्य मांग-आपूर्ति के अनुसार निर्धारित करने का सुझाव दिया गया न कि इसलिए कि राजा को अत्यधिक लाभ हो।

मिलिंद-पन्ह नामक बौद्ध ग्रंथ में बिंदुमती नामक देवदासी का उल्लेख है, जो अपने सभी ग्राहकों के साथ समान व्यवहार करती थी, बशर्ते वे उसका शुल्क भरते। उसके लिए उनका सामाजिक दर्जा कोई मायने नहीं रखता था। तमिल में रचे गए बौद्ध महाकाव्यों के अनुसार राजा व्यापारियों की ईर्ष्या करते थे क्योंकि अपनी रानियों के विपरीत उनकी पत्नियों की पायलों में मोती नहीं बल्कि हीरे जड़ें होते थे।

बाइबल में भी व्यापारी वर्ग की कथाएं हैं। न्यू टेस्टामेंट के प्रसिद्ध पैराबल ऑफ़ टैलेंट्स की एक कहानी में एक व्यक्ति ने अपने तीन दासों को कुछ पैसे दिए। वह इस बात से ख़ुश था कि दो दासों ने उन पैसों का निवेश करके उसे अधिक पैसे लौटाए। दूसरी ओर, तीसरे दास ने वो पैसे बचाकर उतने ही पैसे लौटाए, जिस कारण उसने उसकी कोई सराहना नहीं की।

अरेबियन नाइट्स नामक कहानी संग्रह में ‘सिंबाद के साहसी करतूत’ जैसी व्यापारिक कहानियाँ हैं। सिंबाद एक साहसी व्यापारी था जिसने जहाज़ से यात्रा करके विश्वभर व्यवसाय किया और अमीर बन गया। फिर उसने अपनी कहानी एक ग़रीब सिंबाद को बताई, जो पल्लेदार था और अपनी किस्मत के बारे में सोच रहा था। अमीर सिंबाद ने उसे दूर दराज़ के देशों में जोखिम उठाने की सलाह दी क्योंकि उससे वह अमीर बनकर भविष्य में आरामदायक जीवन जी सकता था। इस प्रकार, सिंबाद की कहानियाँ अरब व्यापारियों पर आधारित थी। ये व्यापारी अरब सागर के पार गए और विश्वभर में वस्तुओं का व्यापार करके उन्होंने उन जगहों को समृद्ध बनाया।

आजकल, इतिहासकार स्तूपों का निर्माण करने वाले राजाओं की कहानियों को महत्त्व देकर उन तमाम व्यापारियों की उपेक्षा करते हैं जिन्होंने बौद्धों के गुफ़ा-मंदिर निर्माण किए, गुजरात में गिरनार की पहाड़ियों पर जैन मंदिर बनाए, जिन्होंने संभवतः हड़प्पा के शहर  बनाए, या उस बनिया समाज की जिनका नाम बरगद के पेड़ को दिया गया चूँकि वे दिन के अंत में उनके नीचे बैठकर लेखा-जोखा पूरा करते थे। स्पष्टतया इतिहास और आख्यानों के प्रति पुराने दृष्टिकोण को बदलकर और समुदायों का समावेश करने का समय आ गया है।


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