December 1, 2025

First published August 10, 2025

 in Dainik Bhaskar

कैसे स्थल-पुराणों से श्रद्धालुओं को सांसारिक जीवन जीने का साहस मिला

diya woman diwali

आज का लेख एक कहानी से शुरू करते हैं। एक बार, विष्णु और लक्ष्मी के बीच हुए झगड़े के बाद लक्ष्मी घर छोड़कर चली गईं और विष्णु उन्हें ढूंढने निकलें। ढूंढते-ढूंढते उन्हें इमली के पेड़ के नीचे दीमक का टीला दिखाई दिया और उन्होंने उसमें वास ले लिया। फिर एक ग्वाले ने आकर उन्हें दूध दिया। इसलिए, विष्णु उस दीमक के टीले को अपना घर बनाकर अपने श्रद्धालुओं को आश्वासन देते रहें कि वे उन्हें सांसारिक जीवन की पीड़ाओं में डूबने नहीं देंगे। यह कहानी कहाँ से आई है?

यदि आप आंध्र प्रदेश और तमिल नाडु के लोगों से पूछें तो वे कहेंगे कि यह वेंकटचलम के तिरुपति बालाजी की कहानी है, जबकि महाराष्ट्र और कर्णाटक के लोग इसे पंढरपुर के विठ्ठल की कहानी कहेंगे। 15वीं सदी के विजयनगर साम्राज्य में ये दोनों देवता महत्त्वपूर्ण थे। तिरुपति बालाजी राज्य की दक्षिणी सीमा के निकट और विठ्ठल उसकी उत्तरी सीमा के निकट पूजे जाते थे। दोनों को विष्णु और विशेषतः कृष्ण का रूप माना जाता है। दोनों के हाथों में हथियार नहीं होते हैं और दोनों अपने हाथ अपने कूल्हे पर रखते हैं, जिससे उनके श्रद्धालुओं को सांसारिक जीवन जीने का साहस मिलता है।

आइए पहले तिरुपति बालाजी की कहानी जानें। कहते हैं कि लक्ष्मी ने भृगु ऋषि को विष्णु के छाती पर लात मारते हुए देखा था। विष्णु ने ऋषि पर क्रोधित होने के बजाय उनसे क्षमा मांगी थी, इस भय से कि उन्होंने ऋषि को खिजाया था। यह देखकर लक्ष्मी को क्रोध आया और वे वैकुण्ठ छोड़ भू-लोक चली आईं। तब विष्णु उन्हें मनाने उनके पीछे आए।

लक्ष्मी को ढूंढते हुए वे वेंकटचलम पहुंचें। वहाँ के सात पहाड़ देखकर उन्हें शेष नाग के सात फनों की याद आई और वे वहाँ रहने लगें। दीमक के टीले ने उन्हें कौशल्या और देवकी की तथा इमली के पेड़ ने उन्हें दशरथ और वासुदेव की याद दिलाई। विष्णु के इस रूप को तिरुपति बालाजी या वेंकटेश भी कहा जाता है। धन के देवता, कुबेर, से मिले ऋण से तिरुपति बालाजी ने वहाँ की राजकुमारी, पद्मावती, से विवाह किया। पद्मावती लक्ष्मी के लिए दूसरा नाम है। तिरुपति बालाजी के श्रद्धालु उन्हें भोजन देते हैं और कुबेर का ऋण चुकाने में उनकी मदद करते हैं।

अब आते हैं विठ्ठल की कहानी की ओर। एक बार, द्वारका में रुक्मिणी ने कृष्ण और राधा को चोरी-छिपे मिलते हुए देखा था। क्रोधित होकर उन्होंने द्वारका छोड़ा और कृष्ण विठ्ठल के रूप में उनके पीछे आए। रुक्मिणी पंढरपुर के निकट एक इमली के वन में रहने लगी। यहाँ रुक्मिणी को बहुधा पदूबाई नामक क्रोधित देवी के रूप में पूजा जाता है, जो अपने केश खुले छोड़कर अपना मुँह धरती में छिपाती हैं। वेंकटचलम में तिरुपति बालाजी की पत्नी, पद्मावती, का पंढरपुर में नाम पदूबाई है अर्थात पदूबाई भी लक्ष्मी ही हैं।

स्थल-पुराणों की इन कहानियों के माध्यम से देशीय देवता विस्तृत हिंदू धर्म के शिव और विष्णु जैसे पौराणिक देवताओं से जोड़ें गए। आर। सी। ढेरे जैसे विद्वानों ने कई स्थल-पुराण इकठ्ठा किए हैं और उनमें कई समानताएं भी पाईं हैं। इन स्थल-पुराणों से पता चलता है कैसे ब्राह्मण संस्कृति, बौद्ध धर्म और जैन धर्म भारतभर फैलें। तीनों का लगभग 2500 वर्ष पहले गंगा के मैदानों में उगम हुआ और ये कहानियां लगभग 1000 वर्ष पहले बताईं जाने लगीं।

ओडिशा के जगन्नाथ का उदाहरण लेते हैं। उनका पहला उल्लेख 14वीं सदी में सारला दास के महाभारत में पाया गया है। वहाँ उन्हें कृष्ण के साथ जोड़ा गया। इसके कुछ समय बाद, ओडिआ रामायण में जगन्नाथ को राम के साथ जोड़ा गया। वहाँ का स्थल-पुराण स्पष्ट करता है कि जगन्नाथ एक जनजातीय देवता थे। वहाँ के राजा, इंद्रद्युम्न, के मंत्री, विद्यापति, इस देवता तक पहुँच पाए थे और सावरा जनजाति के साथ मिलकर उनकी देखभाल करते थे।

लेकिन जगन्नाथ का यह आदिम रूप, नील माधव, अदृश्य हो गया। आज उसकी जगह लकड़ी के डिब्बे में एक गुप्त तत्त्व है। संभवतः ये कृष्ण के अवशेष हैं। बौद्ध धर्मीय भी बुद्ध के अवशेष कुछ यूं ही सुरक्षित रखते थे। विठ्ठल और वेंकटेश की तरह जगन्नाथ भी अपनी पत्नी के साथ लड़ते हैं। हर वर्ष रथ-यात्रा से लौटने पर लक्ष्मी उन्हें मंदिर में प्रवेश करने नहीं देती। आख़िरकार वे लक्ष्मी को पीछे छोड़ अपनी बहन, सुभद्रा, के साथ रथ यात्रा पर जो जाते हैं। फिर उन्हें लक्ष्मी को रसगुल्ले जैसी मिठाइयां देकर मनाना पड़ता है।

देवियों को मनाने की इन कहानियों में न केवल स्थानीय जनजातियों और पशुपालक समाजों को सम्मिलित किया गया बल्कि श्रद्धालुओं को देवताओं के प्रेम और सुरक्षा का आश्वासन भी दिया गया। इस प्रकार, समय के साथ स्थानीय ‘देशी’ देवता विस्तृत, सर्वव्यापी ‘मार्गी’ आख्यान शास्त्र में समाए गए। ये देशी देवता भी कर्म, धर्म, आत्मा, माया, संसार और मोक्ष जैसी धारणाओं के मूर्त रूप बन गए और हिंदू धर्म जनसाधारण तक पहुँच गया।

इस परिवर्तन ने मंदिरों को जन्म दिया, जो आज हिंदू धर्म की पहचान हैं। यह हिंदू धर्म रहस्यमय उच्चारणों और अनुष्ठानों पर आधारित पुराने वैदिक हिंदू धर्म से बहुत अलग है। बौद्ध और जैन धर्म लोगों को सांसारिक जीवन की पीड़ा कम करने का स्पष्ट मार्ग दिखा ही रहें थे। वैदिक धर्मीय जान गए कि यदि उनका धर्म भी बदलकर जनसाधारण को यह मार्ग नहीं दिखाता, तो अन्य दो धर्मों की तुलना में उसका महत्त्व घट जाता था।


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