February 11, 2026

First published March 9, 2025

 in Dainik Bhaskar

मंदिरों में ब्रह्मचर्य की भूमिका

temple

भारत में मंदिर क्यों बनाए गए? उनके बनने से पहले लोग चट्टान, नदी और तारों को पूजते थे। कुम्भ मेला एक अच्छा उदाहरण है जहाँ मानव-निर्मित संरचना के न होते हुए भी हिंदू प्रथाएं की जाती हैं। असम में कामाख्या और जम्मू में वैष्णोदेवी के मंदिरों से हमें पता लगता है कि ये ‘मंदिर’ वास्तव में सादी चट्टानों के चारों ओर बनाईं गईं संरचनाएं हैं। इस प्रकार, मंदिर की सीमा के भीतर नैसर्गिक संरचना को घिरा हुआ पूज्य स्थल निर्धारित किया जाता है।

सीमाओं का निर्माण पितृसत्ता की विशेषता है। यह इसलिए कि सीमाओं से वर्गीकरण निर्माण होता है, जिससे विशिष्ट लोग शक्तिशाली बनते हैं, ठीक पितृसत्तात्मक समुदायों की तरह। मंदिर की दीवारों के माध्यम से मनोवैज्ञानिक सीमाएं व्यक्त की गईं। ये सीमाएं मंदिर तथा देवी-देवताओं के उभरने से बहुत पहले, सभ्यता की शुरुआत में उभरीं, जब प्राणियों से जन्मी मानवता अपने अस्तित्व को समझने का प्रयास कर रही थी।

भारत के प्रत्येक गांव में उर्वरता की ग्राम-देवी और संरक्षक ग्राम-देवता होते हैं। स्त्रैण देवत्व पोषण करता है और पौरुष देवत्व रक्षा करता है। स्त्रैण देवत्व के लिए पौरुष देवत्व मात्र बीज प्रदान कर उसकी रक्षा करता है। कभी-कभार हनुमान, भैंरो बाबा और अय्यनार की तरह यह पौरुष देवत्व ब्रह्मचारी होता है। ब्रह्मचर्य के माध्यम से ये संरक्षक देवता देवी अर्थात उनकी माता के प्रति आदर व्यक्त करते हैं। ब्रह्मचर्य, अर्थात वीर्य के अवरोधन, से वे शक्तिशाली भी बनते हैं।

ब्रह्मचर्य से अलौकिक शक्तियां मिलती हैं इस विचार से मठवासी संप्रदाय जन्में। साधुओं ने पानी पर चलने, हवा में तैरने, आकार बदलने और अमरत्व प्राप्त करने के प्रयास से नैसर्गिक शक्तियों को वश में करना चाहा। वे पीड़ा और भय से मुक्ति प्राप्त करने के लिए मन को भी वश में करना चाहते थे। इन सिद्धों ने योगिनियों की कामुकता का बहिष्कार किया, जो मात्रिकाओं और महाविद्याओं के समूहों में घूमकर उन्हें लुभाती थी।

बौद्ध धर्म भारत का सबसे पहला संगठित मठवासी संप्रदाय था। उसके विहारों में महिलाओं को प्रवेश करना मना था। और जब अंततः उन्हें विहारों में आने दिया, तब उन्हें पुरुषों से कहीं अधिक नियमों का पालन करना पड़ा। यह इसलिए कि उन्हें अपनी तृष्णाओं को वश में करने के साथ-साथ यह निश्चित करना पड़ा कि वे पुरुषों को नहीं ‘लुभाती’। ये विहार चैत्यों के चारों ओर बनाए गए, जिनके भीतर के स्तूपों में बुद्ध के अवशेष होते थे। ये भारत की प्रारंभिक विशाल संरचनाएं थी जो चट्टानों में तराशी गईं। उससे पहले ग्राम देवी-देवताओं के देवालय केवल पेड़ों के नीचे, नदियों को लगकर और गुफ़ाओं में, किसी मानव निर्मित संरचनाओं से अबाध पाए जाते थे।

बौद्ध विचारों का विरोध करने के लिए गृहस्थ जीवन के सुखों को दर्शाने वाले पत्थरों के मंदिर बनाए गए। मंदिर की विधियों में भी विभिन्न सांसारिक सुख व्यक्त किए गए। प्रतिष्ठापित देवी-देवताओं का तिरुपति के ब्रह्मोत्सवम जैसे भव्य समारोहों में विवाह होता था। पुजारी और देवदासियां उनकी देखभाल करते थे।

विहारों में जितनी शांति होती थी उतनी ही चहल पहल इन मंदिर परिसरों में होती थी। वहाँ भव्य स्तर पर सांसारिक सुख मनाए जाते थे। लेकिन बौद्ध विहारों की तरह मंदिर भी पुरुषों के नियंत्रण में थे। जब देवदासियां बहुत शक्तिशाली बन गईं तब इन ब्राह्मण पुरुषों ने अंग्रेज़ों की मदद से उन्हें ‘वेश्या’ ठहराकर बाहर कर दिया।

विडंबना की बात यह है कि मंदिर, जो गृहस्थ जीवन के मूर्त रूप हैं, आज हिंदू महंतों के नियंत्रण में हैं। ब्रह्मचर्य को धार्मिकता और शुद्धता का प्रतीक मानकर उसे शनि और अय्यप्पा जैसे ब्रह्मचारी देवताओं का मूर्त रूप दिया जाता है। और आधुनिक काल में गुरुओं के आश्रमों में संन्यासियों को ‘स्वामी’ और सन्यासिनों को ‘मा’ इन नामों से संबोधित करने से पुरुषों और महिलाओं की परंपरागत भूमिकाओं की पुष्टि की जाती है।

क्या ब्रह्मचर्य महिलाओं का आदर करना है या क्या वह बस महिलाओं का द्वेष करने का एक मार्ग है? संरक्षक देवता, गुरु, महंत और पुरुष श्रद्धालु स्त्रैण को नकारते क्यों हैं? क्या यह इसलिए है कि तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार वीर्यपात न करने से अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं? या क्या वह इसलिए है कि वे मासिक धर्म का अनुभव करने वाली महिलाओं से दूर रहकर अपने आप को शुद्ध रखते हैं? कुछ लोग इन्हें परंपरागत विचार मानते हैं तो कुछ और उन्हें अंधविश्वास मानते हैं। जो भी हो, सक्रियतावादी इन लोकप्रिय विचारों पर बहस नहीं करना चाहते क्योंकि वैसा करना असहज होगा।

आजकल हम 20वीं सदी के प्रारंभ में पुरुष प्रधान, मठवासी हिंदू संघटनों द्वारा लोकप्रिय बनाए नव-वेदांत की नीरसता पसंद करते हैं। नव-वेदांत के अनुसार परमात्मा का न कोई लिंग न कोई लैंगिकता होती है और इसलिए वह पुरुष और स्त्रियों को समान मानता है। मासिक धर्म का अनुभव करने वाली महिलाएं भले ही मंदिरों में प्रवेश करें। लेकिन इससे पितृसत्तात्मक विचारों को चुनौती नहीं दी जाती, जो ‘ब्रह्मचर्य’ को शुद्ध और ‘कामुकता’ को अशुद्ध मानते हैं।


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