हिंदू धर्म में साधारणतः ब्रह्मा को नहीं पूजा जाता है, बावजूद इसके कि वे इस सृष्टि के सृजनकर्ता हैं। इसके कई कारण हैं। एक कहानी के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच इस बात पर विवाद हुआ कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। तब अचानक से पृथ्वी और आकाश दोनों में छेद करता हुआ अग्नि का विशाल स्तंभ वहाँ प्रकट हुआ। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने तय किया कि जो उस स्तंभ का स्रोत ढूंढता वह श्रेष्ठ होता। ब्रह्मा हंस का रूप लेकर स्तंभ का स्रोत ढूंढने के लिए आकाश में उड़ें, जबकि विष्णु वराह का रूप लेकर पृथ्वी के भीतर गए।
लेकिन दोनों असफल रहें। विष्णु ने हार स्वीकार की, पर ब्रह्मा ने स्तंभ का स्रोत पाने का झूठा दावा किया। तब शिवजी उस स्तंभ के भीतर से प्रकट हुए। वह स्तंभ उन्हीं की असीम शक्ति का प्रतीक था। उन्होंने क्रोधित होकर ब्रह्मा को श्राप दिया कि उन्हें कभी किसी मंदिर में पूजा नहीं जाएगा। ब्रह्मा ने उनसे क्षमा मांगी। तब शिवजी ने कहा कि वे राजस्थान में पुष्कर की झील के पास के एक मंदिर में पूजे जाएंगे। हालाँकि दक्षिण भारत में विष्णु को समर्पित विशाल मंदिर परिसरों में ब्रह्मा को समर्पित कुछ छोटे मंदिर पाए जाते हैं, साधारणतः हिंदू देव गण में ब्रह्मा इतने लोकप्रिय देवता नहीं हैं।
इसलिए, थाईलैंड के बैंकॉक में ब्रह्मा को समर्पित अत्यंत लोकप्रिय और पूज्य तीर्थस्थान देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह शानदार तीर्थस्थान वहाँ के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के निकट, एरावान में ग्रैंड हायट होटल के परिसर के भीतर रास्ते के किनारे स्थित था। सुनहरी चतुर्मुख, चतुर्भुज मूर्ति दण्ड, चम्मच, जपमाला और पुस्तक धारण की हुई थी और उसकी गोद में एक कमण्डलु था, मानो वह यज्ञ प्रारंभ करने जा रहा पुजारी था। उसकी छाती पर जनेऊ स्पष्ट दिखाई दे रहा था। चूँकि तीर्थस्थान किसी से घिरा हुआ नहीं था, इसलिए सभी दिशाओं से चारों मुख दिखाई दे रहें थे। प्रत्येक मुख के सामने फूलों का एक ढेर था।
दर्जनों थाई यहाँ तक कि कुछ चीनी श्रद्धालु भी प्रत्येक मुख की पूजा कर रहें थे। सभी मुखों की पूजा करने के बाद वे चांदी के एक विशाल पात्र में रखे पवित्र जल से अपने हाथ और सर धो रहें थे। तीर्थस्थान के चारों ओर सैंकड़ों दीप और अगरबत्तियां जल रहीं थी। उसकी एक ओर मंडप के नीचे कुछ सुंदर नर्तकियां बैठीं थी। उन्हें पैसे देने पर वे परंपरागत गीत पर गायन और नृत्य करती थी। वहाँ के गाइड के अनुसार इससे हिंदू देवता प्रसन्न होते हैं।
1950 के दशक में थाईलैंड में एक भव्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। उस सम्मेलन के प्रतिनिधियों के लिए सरकार उतना ही भव्य एरावान होटल निर्माण करने लगा। दुर्भाग्यवश, होटल के निर्माण के हर चरण पर विलंब होते गया। और जब क़ीमती संगमरमर से भरा जहाज़ बैंकॉक पहुंचने के बजाय लापता हो गया, तब वहाँ काम करने वाले मज़दूर समझ गए कि कुछ सही नहीं था। उन्होंने निर्णय लिया कि उस भूमि के संरक्षक आत्माओं को शांत किए बिना वे काम नहीं करेंगे।
जो कंपनी होटल का निर्माण कर रही थी उसने इस समस्या को हल करने की ज़िम्मेदारी बैंकॉक के पुलिस मेजर जनरल को सौंपी। उन्होंने एक विख्यात ज्योतिष, रियर एडमिरल लुआंग सुविचर्नपट, से मदद मांगी।
श्री सुविचर्नपट ने विस्तारपूर्वक गणना करने पर पाया कि होटल की नींव अशुभ समय डाली गई थी। उन्होंने इसके लिए एक उपाय ढूँढा। इस भूमि की आत्मा को समर्पित तीर्थस्थान निर्माण करना आवश्यक था। यह तीर्थस्थान इस भूमि के सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा देवता, चतुर्मुख थान ताओ महाप्रॉम, के सम्मान में बनाया गया, क्योंकि वह सबसे शुभ होता और उससे नींव डालने में भूल सुधारी जा सकती थी।
थान ताओ महाप्रॉम की प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्ति बनाई गई और उसपर सोना चढ़ाया गया। उसे 9 नवंबर 1956 को तीर्थस्थान में रखा गया। हर वर्ष इसी दिन हज़ारों श्रद्धालु उनका आशीर्वाद लेने और उनकी मदद मांगने आते हैं। तीर्थस्थान बनने के बाद होटल का निर्माण बिना किसी बाधा के पूरा हुआ।
यह मान्यता है कि थान ताओ महाप्रॉम कृपा, दयालुता, सहानुभूति और निष्पक्षता से परिपूर्ण एक ब्रह्मा देवता हैं। प्रत्येक विशेषता इस मूर्ति के मुखों में दिखाई जाती है, जिस कारण उसकी कृपा सभी पर झलकती है। अधिकांश विदेशी पर्यटकों के लिए थान ताओ महाप्रॉम यह नाम याद रखना या उसका उच्चार करना भी कठिन था। इसलिए, समय के साथ यह तीर्थस्थान एरावान के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि उनका वाहन तीन मुखों वाला गज, एरावान, था।
अगले सप्ताह के लेख में हम इस तीर्थस्थान पर चर्चा जारी रखेंगे।











