पिछले सप्ताह हमने नेपाल के इतिहास पर बौद्ध धर्म के प्रभाव के बारे में जाना। आज के लेख में हम जानेंगे कैसे यह प्रभाव घटकर नेपाल हिंदू धर्म की ओर मुड़ा
भारत की तरह नेपाल में भी बौद्ध धर्म व्यापारी समुदायों में पनपा, जबकि हिंदू धर्म कृषि समुदायों में पनपा। इसलिए, जब नेपाल की अर्थव्यवस्था में व्यापार का प्रभाव घटकर कृषि का प्रभाव बढ़ा तब हिंदू धर्म के अनुयायी भी बढ़ें। बौद्ध धर्मियों ने न केवल ब्रह्मचारी भिक्खुओं को संपत्ति तथा भूमि दान की बल्कि उस भूमि पर विहार भी बनाए। भिक्खुओं की संतान न होने के कारण इस संपत्ति पर संघ का अधिकार होता था। दूसरी ओर, किसानों की संपत्ति और भूमि उनकी संतानों की बन जाती थी।
निस्संदेह, इस परिवर्तन का श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है, जिन्होंने बौद्धिक वादविवाद के माध्यम से बौद्ध धर्म को ‘उलटकर’ भिक्खु तथा भिक्खुनियों को रहस्यमय तांत्रिक विधियां करने के बजाय सांसारिक जीवन जीने के लिए विवश किया। यह भी मान्यता है कि उन्होंने बौद्ध पुण्यस्थलों को हिंदू मंदिरों में बदलकर उनमें हिंदू विधियां स्थापित की और केरल के वैदिक पुजारी नियुक्त करने की प्रथा शुरू की। लेकिन गौतम बुद्ध और सम्राट अशोक के नेपाल यात्रा की तरह 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य की नेपाल यात्रा भी संभवतः तथ्य के बजाय आख्यान जैसी प्रतीत होती है।
नेपाल पर शंकराचार्य के वैदिक प्रभाव के साथ-साथ वज्रयान बौद्ध धर्म के 64 महासिद्ध कवियों और उनकी चर्या-पद कविताओं का भी प्रभाव था। फिर 10वीं सदी में नाथ-जोगी नेपाल आए। यह माना जाता है कि इन उग्र तपस्वियों ने स्थानीय योगिनी-देवियों और नाग-देवताओं से लड़कर मौसम पर नियंत्रण पाया। एक आख्यान के अनुसार, जब गोरखनाथ अपने गुरू, मत्स्येन्द्रनाथ, का स्वागत करने हेतु अपना ध्यान रोककर खड़े हुए तब उनके आसन के नीचे फँसे नाग बाहर आए और नेपाल का दीर्घकालीन सूखा ख़त्म हुआ।
13वीं सदी से, इस्लामी तुर्की सरदारों ने गंगा के मैदानों के पार फैलते हुए बंगाल को वश में कर लिया। इसलिए, कई हिंदू नेपाल जाकर वहाँ के राजाओं के पास शरण लेने लगें। नेपाल में मिथिला के क्षेत्र से जुड़ें मल्ल राजाओं का प्रभुत्व था। उन्होंने मनुस्मृति की संहिता को नेपाल में औपचारिक बनाया, जिससे नेपाल के 64 समुदाय चार वर्णो में विभाजित हुए।
हिंदू राजाओं ने नेपाल में स्वयंभूनाथ जैसे बौद्ध पुण्यस्थलों, मत्स्येन्द्रनाथ तथा पशुपतिनाथ जैसे हिंदू पुण्यस्थलों और स्थानीय देवियों की उपासना से अपने राजत्व को वैध बनाया। समय के साथ पशुपति पुराण, नेपाल माहात्म्य और हिमालय खण्ड जैसे नेपाल के अपने पुराण रचे गए। इसके साथ स्वस्थानी माता जैसी स्थानीय देवियों की व्रत कथाओं में अन्य हिंदू देवी-देवताओं की कथाएं सम्मिलित होने लगीं। इस प्रकार, नेपाल का क्षेत्र अर्थात नेपाल मंडल विस्तृत हिंदू ब्रह्माण्डविज्ञान का भाग बन गया।
तिब्बत के ज़रिए नेपाल चीन के संपर्क में था। चीनी सम्राट की अपेक्षा थी कि नेपाल उन्हें कर अदा करेगा, जो नेपाल को अमान्य था। नेपाल में कई स्वतंत्र राज्य थे, जिनमें झगड़े होने के बावजूद उनके राज परिवार संबंधित थे और सभी की संस्कृति एक जैसी थी। 18वीं सदी में नेपाल के उत्तर पश्चिमी पहाड़ों के गोरखा (छेत्री) राजा, जो अपने आप को भारत के राजपूतों के वंशज मानते थे, ने नेपाल पर नियंत्रण पाकर उसका एकीकरण किया। गोरखा यह नाम महान नाथ जोगी, गोरखनाथ, से आया है। आख्यानों के अनुसार, गोरखनाथ ने अपने गुरु, मत्स्येन्द्रनाथ, को तांत्रिक योगिनियों के जाल से बचाया था। यह संभवतः शैववाद का तांत्रिक बौद्ध धर्म पर विजय का संकेतक है।
18वीं सदी में नेपाल के राजा, पृथ्वी नारायण शाह, ने उसे ‘असल हिंदुस्तान’ घोषित किया और नेपाल
निर्णायक ढंग से हिंदू धर्म की ओर मुड़ गया। 19वीं सदी में, उनके उत्तराधिकारी ने ‘मुलुकी ऐन’ नामक नियमावली स्थापित की, जिसने समुदायों को जाति के आधार पर वर्गीकृत किया।
उच्च जातियां जनेऊ पहनती थीं। कुछ जातियों को दास बनाया जा सकता था, जबकि अन्य जातियों को दास नहीं बनाया जा सकता था। कुछ जातियों के सदस्यों से पानी लिया जा सकता था, लेकिन उन्हें स्पर्श करना वर्जित था जबकि कुछ जातियों के सदस्यों से पानी लेना सख़्त मना था। इस प्रकार, हिंदू धर्म से जुड़ी शुद्धता की धारणा पर आधारित एक श्रेणीबद्ध समाज निर्माण किया गया, जिसमें सभी समुदायों पर अलग नियम लागू होते थे।
20वीं सदी में, सती की प्रथा और ग़ुलामी पर प्रतिबंध लगाया गया और जाति के आधार पर आरक्षण शुरू किया गया। और जैसे कि हम जानते हैं, 2008 में धर्मनिरपेक्ष गणत्रंत की स्थापना के साथ-साथ हिंदू राजतंत्र का अंत हुआ।
नेपाली हिंदू धर्म की स्पष्ट विशेषता उसका उग्र रूप है, क्योंकि वह तांत्रिक देवियों, शिव और कनफटा नाथ जोगियों से जुड़ा है। दूसरी ओर, नेपाली हिंदू धर्म में स्थानीय संगीत और नृत्य परंपराओं पर आधारित भक्ति विचारधारा नहीं फैली। हम यह दावा भी कर सकते हैं कि नेपाल में हिंदू धर्म का पुराना, पूर्व-इस्लामी रूप जीवित रहा, जिसपर भारतीय हिंदू धर्म के विपरीत इस्लाम का कोई असर नहीं हुआ।










