भारत और अरब के बीच व्यापार का लंबा इतिहास है। लगभग 4000 वर्ष पहले, हड़प्पा की सभ्यता और अरब के बीच समुद्री व्यापार होता था। नाविक पंछियों की मदद से समुद्रतट की दिशा और उससे दूरी निर्धारित कर जहाज़ों को समुद्रतट के निकट रखते हुए यात्रा करते थे। यह हमें हड़प्पा के मुहरों से पता चला है।
फिर 2000 वर्ष पहले, मॉनसूनी हवाओं की खोज हुई। उनकी मदद से अरबी व्यापारी गर्मी में भारत और उससे भी पार दक्षिण-पूर्वी एशिया तक यात्रा करते थे और ठंडी में हवा की दिशा बदलने पर अरब लौटते थे। इस समुद्री मार्ग पर यमन के सोकोत्रा द्वीप के निकट की यात्रा जोखिमभरी होती थी। परिणामस्वरूप, समय के साथ गुजरात के समुद्रतट पर वाहनवटी सिकोतर माता को पूजा जाने लगा, जो जहाज़ों की रक्षा करती थी।
1400 वर्ष पहले, अरब में एक महत्त्वपूर्ण घटना घटी। मक्का के एक व्यापारी ने घोषणा की कि एकमात्र सच्चे ईश्वर, अल्लाह, ने मानवता तक अंतिम पैग़ाम पहुंचाने के लिए उन्हें अपना अंतिम पैग़म्बर निर्धारित किया था। वे मुहम्मद पैग़म्बर कहलाए और उन्होंने अन्य देवताओं को पूजने की पूर्व-इस्लामी प्रथा को वर्जित किया। अल्लाह का पैग़ाम स्वीकारने वालों से मक्का की दिशा में मुड़कर दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ना और जीवन में एक बार मक्का जाकर सात बार घड़ी की उलटी दिशा में क़ाबा के चारों ओर चलना भी अपेक्षित था। यह हिंदू और बौद्ध धर्मों के विपरीत था, जिनमें घड़ी की दिशा में प्रदक्षिणा करना पूज्य माना जाता है।
मक्का जेद्दाह नामक तटवर्ती शहर के निकट था। भारत से भूमध्यसागर के क्षेत्रों तक जाने वाले मसाले और कपड़े इसी शहर से होकर जाते थे। इस्लाम में माना जाता है कि जन्नत से बाहर निकाले जाने पर आदम और हव्वा एक दूसरे से अलग हुए थे। आदम भारत के निकट गिरे और हव्वा जेद्दाह के निकट। अंत में, उनका मिलन मक्का में हुआ। अरब में कई महत्त्वपूर्ण व्यापारी महिलाएं होती थी। मुहम्मद पैग़म्बर की पहली पत्नी उनमेंसे एक थी।
अरब से बाहर की यात्रा पुरुष करते थे। जो नाविक केरल जाकर वहाँ की महिलाओं से विवाह करते उन्हें मापलई कहा जाता था। मापलई दामाद के लिए मलयालम शब्द है। संभवतः, इन नाविकों की अरब में भी पत्नियां रहीं होंगी, जहाँ वे ठंडी के मौसम में लौटते थे।
इन नाविकों के ज़रिए भारत ने पहली बार एकमात्र सच्चे ईश्वर, अल्लाह, के बारे में जाना होगा, वे जिनकी कोई प्रतिमा नहीं होती, जो किसी और देवता की आराधना नहीं स्वीकारते और जिनका पैग़ाम केवल अरबी में प्राप्त होता है। यह देवत्व की भारतीय सोच से बहुत अलग है, जहाँ देवत्व विभिन्न देवताओं का रूप लेती है और उन्हें मंदिरों में पूजा जाता है।
भारत से न केवल सूती कपड़े, बल्कि गन्ने के रस से बनी चीनी भी निर्यात हुई। और वस्तुओं के साथ-साथ विचारों का भी आदान-प्रदान हुआ। पंचतंत्र और जातक कथाओं के अलावा शून्य और अनंत जैसी धारणाएं भी अरब पहुंचीं। 10वीं सदी के बाद शून्य की धारणा अरबी व्यापारियों के साथ पहली बार यूरोप गई।
अरब के अरेबियन नाइट्स नामक कहानी संग्रह में व्यापारियों की कई कहानियां हैं, जैसे सिंबाद की कहानी। इस कहानी ने लोगों को सिंबाद की तरह व्यापार अपनाकर समृद्ध बनने की सलाह दी।
एक कहानी अलादीन और उसे मिले जादुई दीए की है। इस दीए के भीतर स्थित जिन्न उसकी इच्छाएं पूरी कर वह अमीर बन जाता है। ऐसे ही एक जिन्न ने सुलतान सुलैमान के लिए पत्थर के विशाल शहर निर्मित किए थे। सुलैमान अल्लाह के एक पैग़म्बर थे और अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे।
भारत में भी ऐसी कहानियां पाईं जाती हैं। सुलैमान जैसे राजा विक्रमादित्य भी बुद्धिमान थे, उनका जादुई सिंहासन था और जिन्न की तरह एक वेताल उन्हें सलाह देता था। राजा विक्रमादित्य की कहानियों में उनका साहस, उदारता और बुद्धि स्पष्ट दिखाई देते हैं। विक्रमादित्य में छापा मारने और व्यापार करने के जोखिमभरे अभियानों पर जाने का साहस था, जिनसे वे संपत्ति के साथ लौटते थे। वे उदार थे और इसलिए यह संपत्ति लोगों में बांटते थे। और बुद्धिमान होने के कारन वे यह संपत्ति लोगों में उचित ढंग से बांटते थे। अरब के सुलतान सुलैमान में भी यहीं विशेषताएं थी।
ये कहानियां मध्य-पूर्वी एशिया में फैलीं। अरबी और फ़ारसी संस्कृतियों के मिलन से एक महत्त्वपूर्ण व्यापार जाल निर्माण हुआ, जिसके केंद्र में बग़दाद स्थित्त था। यह जाल उससे पहले के रोमीय काल और कांस्य युग के व्यापार जालों जितना ही महत्त्वपूर्ण था।
शुरू में व्यापारियों ने इस्लाम अपनाया। छापामार हमेशा उनके कारवानों पर हमला करते थे, जिस कारण उन्हें योद्धा भी बनना पड़ा। समय के साथ स्वंय लड़ने के बजाय वे इस काम के लिए सिपाहियों को किराए पर रखने लगें। यूरेशिया के युवाओं को ग़ुलाम बनाकर मिस्र, लेवांत, मेसोपोटामिया, फ़ारस और मध्य एशिया के व्यापारियों को बेचा जाता था। इन योद्धाओं को भोजन, कपड़े और रहने की जगह दी जाती थी और बदले में वे कारवानों और व्यापार मार्गों की रक्षा करते थे। वे मामलुक कहलाए। इस प्रकार, सैनिकों को किराए पर रखने की व्यवस्था स्थापित हुई। आगे जाकर वह भारत में भी लोकप्रिय हुई, विशेषतः 14वीं शताब्दी में तैमूर के आक्रमण के बाद।
दो फ़सलों की कटाई के बीच किसान घर से दूर रहते हुए किराए पर लड़ते थे। वे जोगी का जीवन अपनाकर पत्नीव्रता रहते थे। इससे बारहमासा गीतों का जन्म हुआ, जिनके द्वारा महिलाओं ने अपने ‘जोगिया’ पतियों के प्रति विरह व्यक्त किया। कुछ इसी तरह अरब संस्कृति भी अपने विरहपूर्ण गीतों के लिए जानी जाती थी। आगे जाकर इन्हीं गीतों ने सूफ़ी संतों की रहस्यमयी कविताओं को प्रेरित किया, जिनमें उन्होंने अल्लाह से मिलन की तृष्णा व्यक्त की।











