1200 वर्ष पहले आदि शंकराचार्य ने जिस प्रकार हिंदू धर्म को व्यक्त किया वह लगभग 150 वर्ष पहले स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती की अभिव्यक्तियों से बहुत अलग था। यह इसलिए कि तीनों को अलग प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, हालाँकि तीनों अभिव्यक्तियों में बहुत समानताएं भी थी।
तीनों पुरुष जीवनभर ब्रह्मचारी रहें। उन्होंने जीवन के स्वरूप पर चिंतन किया और वह ज्ञान अपने अनुयायियों तक पहुंचाया। शंकराचार्य ने अपनी माँ को उन्हें तपस्वी बनने देने के लिए विवश किया। स्वामी विवेकानंद का एक कुलीन परिवार में जन्म हुआ था। अपने जन्म के समय वे नरेंद्रनाथ दत्ता कहलाए। उन्होंने भी साधु बनना चुना। दयानंद सरस्वती की सगाई हुई थी। लेकिन उन्होंने अपनी सगाई तोड़ दी।
शंकराचार्य के गुरु, गौडपाद, एक साधु थे जिनपर महायान बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था। विवेकानंद के गुरू, रामकृष्ण परमहंस, काली देवी के मंदिर में पुजारी थे। वे तंत्र में निपुण थे और अन्य धर्मों से भी परिचित थे। दयानंद के गुरू, विरजानंद दंडीश, संस्कृत व्याकरण और वेदों के विद्वान थे।
शंकराचार्य के समय बौद्ध धर्म बहुत लोकप्रिय था। लेकिन यह बौद्ध धर्म का श्री लंका में प्रचलित मठवासी थेरवाद संप्रदाय नहीं था, जो विपश्यना में लोकप्रिय है। उस समय भारत में महायान, वज्रयान और तांत्रिक बौद्ध धर्म लोकप्रिय थे, जिनमें स्त्री रूप को योगिनियों और तारा देवी के माध्यम से महत्त्व दिया गया। इन संप्रदायों में बुद्ध को हेरुक जैसा भयंकर रूप दिया गया जिसने हिंदू देवताओं को कुचला। दूसरी ओर, विवेकानंद और दयानंद को अंग्रेज़ों और ईसाई धर्म प्रचारकों के विरोध का सामना करना पड़ा, जो हिंदू धर्म को बर्बर मानकर मूर्तिपूजा को नीचा समझते थे।
हालाँकि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म को चुनौती दी, उनके लेखनों में ‘शून्य’ की बौद्ध धारणा और ‘निर्गुण ब्रह्मन’ की वैदिक धारणा में समानताएं थी। इसलिए, लोगों ने उनपर बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म में अपनाने का आरोप लगाया। उसी तरह, 19वीं सदी के अन्य सुधारकों की तरह, विवेकानंद और दयानंद पर भी ईसाई प्रथाएं अपनाकर उन्हें हिंदू रूप देने का आरोप लगाया गया।
शंकराचार्य के समय में न भारतवासी विदेश उत्प्रवास कर रहें थे और न ही विदेशी भारत में अप्रवास कर रहें थे। उस समय जाति व्यवस्था भी प्रचलित थी। लेकिन कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी जाति बदल नहीं सकता था अर्थात उसकी जाति उसने किस परिवार में जन्म लिया है उसी पर निर्भर थी। शंकराचार्य ने धर्म-परिवर्तन की धारणा भी नहीं समझी होती, जो 19वीं सदी में प्रचलित होकर लोकप्रिय बनी। तबसे हिंदू धर्मीय ईसाई बनने लगें, यूरोपीय लोगों ने हिंदू धर्मीय बनना चाहा और विदेश में रहने वाले हिंदुओं को दूसरों को अपने धर्म का स्पष्टीकरण देना पड़ा।
इसलिए, शंकराचार्य के लेखनों में शुद्धिकरण के अनुष्ठान का कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में यह अनुष्ठान दयानंद ने स्थापित किया, ताकि लोग फिर से हिंदू बन सकें। विवेकानंद ने विदेश जाने का कदम उठाया, जो उस समय सभी के सोच के बाहर था। उन्होंने पाश्चात्य लोगों को वेदांत से परिचित किया और हिंदू धर्म को नए तरीक़े से प्रस्तुत किया।
शंकराचार्य का वेद और पुराणों को जोड़ने में भी बहुमूल्य योगदान रहा। उस समय का ब्राह्मण समाज पुराने यज्ञ के अनुष्ठान और नए मंदिर अनुष्ठान करने वालों में विभाजित था। शंकराचार्य ने दोनों को जोड़ने की नींव डाली। उन्होंने निर्गुण ब्रह्मन और सगुन ब्रह्मन की धारणाओं को जोड़ा। वे शैववाद, वैष्णववाद, स्मार्त और सिद्ध परंपराओं को भी समझते थे। इससे स्पष्ट है कि वे चारों को एक साथ लाने का प्रयास कर रहें थे। यही कारण है कि भारत के अधिकांश तीर्थस्थान शंकराचार्य से जुड़ें हैं।
19वीं सदी में भी कुछ तनाव थे। दयानंद वेद संहिताओं में हिंदू धर्म का सार ढूंढने का प्रयास कर रहें थे। उन्होंने पुराणों और मंदिर पर आधारित परंपराओं को पूर्णतः नकारा। इसके विपरीत, विवेकानंद मंदिर पर आधारित परंपराओं का आदर करते थे और उन्होंने रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत काली पूजा स्थापित की।
शंकराचार्य ने उपनिषदों पर आधारित वेदांत अर्थात उत्तर मीमांसा को स्वीकारा और यज्ञ पर आधारित पूर्व मीमांसा को नाकारा। विवेकानंद भी इसी के समर्थक थे। दूसरी ओर, दयानंद ने वैदिक स्तोत्रों के जप और यज्ञ के अनुष्ठानों को उपनिषदों से अधिक महत्त्व दिया।
शंकराचार्य शारदा देवी के भक्त थे और उन्होंने उभय भारती नामक स्त्री विद्वान से सीख प्राप्त की थी। विवेकानंद काली भक्त थे। शंकराचार्य के समय से संपूर्ण समाज में महिलाओं के शिक्षण को दिया गया महत्त्व घटने लगा था। उनके शिक्षण का पुनरुत्थान एक हज़ार वर्ष बाद विवेकानंद और दयानंद के अनुयायियों द्वारा स्थापित पाठशालाओं में ही शुरू हुआ।











