December 7, 2025

First published July 27, 2025

 in Dainik Bhaskar

हड़प्पा की सभ्यता ने एक क़ीमती पत्थर को क्यों नकारा

mohenjodaro harappa map

कल्पना करें कि आप 5000 वर्ष पहले के मिस्र और मेसोपोटामिया (जहाँ वर्तमान का इराक़ देश स्थित है) पहुंचे हों। आपको वहाँ के देवी-देवताओं की मूर्तियां बड़ी उल्लेखनीय लगेंगी। उनमें बाल, भौंहें और आँखें सभी नीले रंग के होंगे। और इस स्पष्ट नीले रंग के पास सोना या तांबा होगा। यह चमकीला नीला रंग मूर्तियों में जड़ित लापिस लाज़ुली नामक पत्थर का है।

लापिस लाज़ुली न मिस्र में और न ही मेसोपोटामिया में पाया जाता है। वह बहुत दूर, अफ़ग़ानिस्तान में पाया जाता है। तो फिर हज़ारों वर्ष पहले यह पत्थर अफ़ग़ानिस्तान से फ़ारस के पठार से होते हुए मेसोपोटामिया तक और फिर उससे आगे मिस्र तक कैसे पहुंचा? इसका कारण जानना भी आवश्यक है।

इतिहासकारों के प्रयासों के कारण अब हम यह स्पष्टतया कह सकते हैं कि इन प्राचीन सभ्यताओं में नीले रंग का लापिस लाज़ुली पत्थर विलासिता की वस्तु नहीं माना जाता था। इसके बदले वे मानते थे कि उस पत्थर का देवत्व के साथ संबंध था।

प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया के निवासी मानते थे कि मंदिरों में स्थित उनके देवी-देवता सजीव किए जा सकते थे। लेकिन इसके लिए आवश्यक था कि उनकी मूर्तियां अफ़ग़ानिस्तान और भारत जैसे दूर स्थित क्षेत्रों से लाए गए मूल्यवान, दुर्लभ पदार्थों से बनाईं जाएं। व्यापार मार्ग इसी मांग को पूरा करने के लिए निर्माण हुए। इन मार्गों से प्राचीन काल का मिस्र लेवांत (आज का इज़रेल देश) और मेसोपोटामिया से जुड़ गया। मेसोपोटामिया से ये मार्ग धातुओं से परिपूर्ण तुर्की के पहाड़ों तक और उससे आगे फ़ारस की खाड़ी के समुद्रतट तक जाते थे। वहाँ से व्यापारी समुद्रतट से होते हुए सिंधु नदी की नदीमुख भूमि तक पहुंचते थे। कच्चे और तैयार लापिस लाज़ुली का लेन-देन यही होता था।

अफ़ग़ानिस्तान में मिलने वाला कच्चा लापिस लाज़ुली सिंधु नदी से होते हुए हड़प्पा के शहरों तक पहुंचाया जाता था। वहाँ उसके मनके बनाए जाते थे। फिर ये मनके जहाज़ से मेसोपोटामिया तक ले जाए जाते थे। वहाँ से उन्हें मिस्र ले जाया जाता था। अंत में अनुष्ठानों के माध्यम से इस नीले पत्थर को मूर्तियों में जड़कर उन्हें पवित्र बनाया जाता था।

इस प्रकार, पवित्रता हड़प्पा की सभ्यता से मेसोपोटामिया तक पहुंचती थी। ये पवित्र पत्थर अफ़ग़ानिस्तान से शुरू होते हुए आज के पकिस्तान के समुद्रतट से होकर मेसोपोटामिया तक पहुँचने वाले मार्गों से ले जाए गए। पहले यह मान्यता थी कि ये मार्ग केवल व्यापार और विलासिता की वस्तुओं की मांग के कारण बनें थे। लेकिन अब हम जानते हैं कि दूर स्थित वस्तुओं का पवित्र माना जाना उनके बनने का एक महत्त्वपूर्ण कारण था। कांस्य युग के महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग न केवल इसलिए बने रहें कि लोग सांसारिक वस्तुएं चाहते थे बल्कि इसलिए भी कि दूर जगहों में स्थित इन लोगों ने अपने देवताओं की मूर्तियों को पवित्र बनाना आवश्यक समझा।

हड़प्पा के बारे में विचित्र बात यह है कि उसमें पवित्रता दूर से आने वाली दुर्लभ वस्तुओं के संचय से नहीं बल्कि उसके बिल्कुल विपरीत प्रथाओं के कारण स्थापित हुई। उस समाज ने आस-पास के क्षेत्रों में मिलने वाली वस्तुओं को नकारा। उदाहरणार्थ, मेसोपोटामिया के साथ घनिष्ट संबंध रखने के बावजूद हड़प्पा ने न वहाँ की क्यूनिफ़ोर्म लिपि अपनाई और न ही मेसोपोटामिया जैसे विशाल स्मारक और समाधियां बनाईं।

यह स्पष्ट है कि जितना माल हड़प्पा में आयात हुआ उससे अधिक माल हड़प्पा से निर्यात हुआ। आयात किया गया अधिकाँश माल खाद्य पदार्थों का था अर्थात उस माल से हड़प्पा की संस्कृति पर कोई असर नहीं हुआ। हालाँकि हड़प्पा के मुहर मेसोपोटामिया में पाए गए हैं, मेसोपोटामिया के कोई भी मुहर हड़प्पा में नहीं पाए गए हैं। संभवतः हड़प्पा के लोग ऊन और डामर का आयात करके उनका प्रयोग करते थे । उन्हें विचारों का आदान-प्रदान करने में कोई रूचि नहीं थी और इसलिए उन्होंने अपने आप को सबसे दूर रखा, जैसे संन्यासी करते हैं।

हम पाते हैं कि भारत में प्राचीन काल से आज तक सत्ता सांसारिक संपत्ति के संचय से नहीं बल्कि सांसारिक विकास को नकारने से स्थापित की गई है। इसलिए, प्राचीन काल से भारत में संन्यासी किसी भी धार्मिक संस्थान के अध्यक्षों से अधिक शक्तिशाली रहें हैं। हड़प्पा के शहरों में लापिस लाज़ुली का कोई प्रयोग न होते हुए वहाँ से उसका निर्यात होना इस बात का प्रमाण है।


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