पिछले सप्ताह हमने पाबूजी की लोककथा के माध्यम से जाना कैसे लक्ष्मण, शूर्पणखा और रावण का क्रमशः पाबूजी, राजकुमारी फूलवती और जिंदराव खींची के रूप में पुनर्जन्म हुआ था। आइए आज यह कहानी जारी रखते हैं। ध्यान रहें कि यह एक मौखिक परंपरा है।
पाबूजी के जन्म के कुछ समय बाद उनके पिता, धांधल राठौड़ का निधन हुआ। धांधल राठौड़ की सारी संपत्ति उनके बड़े बेटे, बुरो को चली गई। पाबूजी को कुछ नहीं मिला। लेकिन पाबूजी का भाग्य अच्छा था, क्योंकि उसी समय देवल नामक देवी ने उन्हें एक जादुई घोड़ी प्रदान की। यह घोड़ी उनकी माँ का अवतार थी। बदले में देवी ने पाबूजी से वचन लिया कि वे हमेशा देवी की गायों की रक्षा करेंगे। चूॅंकि देवी ने बुरो के बजाय पाबूजी को चुना था, इसलिए दोनों भाइयों में तनाव निर्माण हुआ।
पाबूजी जिंदराव खींची से पहली बार तब मिलें जब जिंदराव खींची के पिता बुरो की ज़मीन में घुस आएं। इसके बाद हुई लड़ाई में, पाबूजी ने जिंदराव खींची के पिता का वध किया। शांति बनाए रखने के लिए बुरो ने जिंदराव खींची को प्रस्ताव किया कि उसकी बहन, पेमा उनसे विवाह करेगी। लेकिन यह शांति अस्थिर थी क्योंकि जिंदराव खींची हमेशा चाहते थे कि बुरो की गायें और देवल देवी की गायें, जिनकी रक्षा पाबूजी करते थे, वे उनकी बनें।
बुरो की बेटी का नाम केलम था। उसके विवाह में पाबूजी ने उसे लंका की ऊँटनियां भेंट देने का वचन दिया। अपनी जादूई घोड़ी, कालमी पर बैठकर वे समुद्र पार लंका जाकर वहाँ से ऊँटनियां ले आएं। असंभव समझा जाने वाला यह कार्य करने के बाद कई लोग उनके प्रशंसक बन गए। सिंध की राजकुमारी, फूलवती उनकी सबसे बड़ी प्रशंसक बनी। उसने अपने माता-पिता से अपना विवाह पाबूजी से करवाने की मांग की। पाबूजी को विवाह प्रस्ताव भेजा गया। लेकिन वे जीवनभर ब्रह्मचारी बने रहना चाहते थे और इसलिए उन्होंने वह प्रस्ताव नकारा।
बहुत मनाने के बाद पाबूजी फूलवती से विवाह करने के लिए तैयार हुए और सिंध के लिए चल पड़ें। यह जानकर देवल देवी क्रोधित हुईं। वे जानना चाहती थी कि पाबूजी की अनुपस्थिति में देवी की गायों की रक्षा कौन करता। पाबूजी ने उन्हें आश्वासन दिया कि यदि गायों को कुछ भी होता तो वे अपना विवाह छोड़कर गायों की रक्षा करने दौड़ें चले आते। और ठीक यही हुआ।
विवाह में दंपति को अग्नि की सात बार परिक्रमा करनी होती है। पहली तीन परिक्रमाओं में पुरुष आगे चलता है, जिससे स्त्री उसकी पत्नी बनती है। अंतिम चार परिक्रमाओं में स्त्री आगे चलती है, जिससे पुरुष स्त्री का पति बनता है। तीन परिक्रमाओं के बाद फूलवती पाबूजी की पत्नी बन गई थी। लेकिन चौथी परिक्रमा शुरू होते ही देवल देवी पाबूजी के सामने प्रकट होकर चिल्लाईं, “जिंदराव खींची ने मेरी गायें चुराईं हैं। अपना वचन निभाकर उन्हें बचाएं।” कुछ लोगों का मानना है कि देवल देवी सीता का रूप हैं।
पाबूजी ने अपना वचन रखा और विवाह संस्कार पूरे किए बिना ही कालमी पर बैठकर देवल देवी की गायों को बचाने निकलें। उन्होंने फूलवती को वचन दिया कि देवल देवी की गायों को बचाते ही वे लौटकर विवाह संस्कार पूर्ण करेंगे। उन्होंने जाते-जाते फूलवती को एक तोता दिया, “यदि यह तोता मर जाता है तो समझें कि मेरा भी निधन हुआ है।”
जिंदराव खींची और पाबूजी के बीच भीषण युद्ध हुआ और पाबूजी ने गायों को बचा लिया। जिंदराव खींची भी मारे जाते थे। लेकिन पाबूजी ने जिंदराव खींची को जीवित रखा क्योंकि वे अपनी सौतेली बहन, पेमा को विधवा नहीं बनाना चाहते थे।
बाद में जिंदराव खींची ने एक और सेना खड़ी करके पाबूजी पर फिर से वार किया। पाबूजी समझ गए कि उनकी नियति में जिंदराव खींची के हाथों वध होना लिखा था। इसलिए, युद्ध के दौरान उन्होंने जिंदराव खींची का चाबुक छीनकर उन्हें अपनी तलवार दे दी। फिर वे जिंदराव खींची को उनपर वार करने के लिए उकसाने लगें। लेकिन जिंदराव खींची पाबूजी का आदर करने लगें थे और इसलिए उन्होंने अपने आप को रोके रखा।
पाबूजी ने जिंदराव खींची को कई बार चाबुक से मारा। अंत में जिंदराव खींची ने उनपर उन्हें दी गई तलवार से वार किया। रावण के अवतार द्वारा लक्ष्मण के अवतार पर वार होते ही एक दैवी पालखी प्रकट हुई और वह पाबूजी और उनकी जादुई घोड़ी, कालमी को राम के वैकुंठ ले गई।
पाबूजी के वध का प्रतिशोध उनके भतीजे, रूपनाथ ने लिया, जिसके पिता, बुरो भी जिंदराव खींची के हाथों मारे गए थे। रावण के अवतार का वध करने के बाद रूपनाथ तपस्वी गोरखनाथ का अनुयायी बना और उसने हथियार हमेशा के लिए त्याग दिए।
उधर, दूर सिंध में, फूलवती के हाथ में तोता मर गया। शूर्पणखा के अवतार को समझ आया कि पाबूजी का निधन हुआ था। वह आग में छलांग मारकर सती चली गई। हालाँकि फूलवती पाबूजी की पत्नी बनी थी, पाबूजी उसके पति कभी नहीं बनें थे।
इस प्रकार, इस लोककथा से हम पुनर्जन्म और कर्म की धारणाएं समझते हैं। हम समझते हैं कि लक्ष्मण को शूर्पणखा की नाक काटने और रावण का वध करने के लिए कर्म का फल भोगना पड़ा। आख़िरकार, जीवन चक्र में कोई नहीं बचता है।











