February 13, 2026

First published March 2, 2025

 in Dainik Bhaskar

कुम्भ मेलों और आर्यावर्त में संबंध

rishi agastya sadhu mendicant

हालाँकि कुम्भ मेले मुख्यतः उत्तर भारत में आयोजित किए जाते हैं, दक्षिण भारत में भी कुम्भकोणम के महामहम कुंड में ऐसा एक जमाव होता है। वह हर बारह वर्ष, माघ महीने में, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के थोड़े समय बाद होता है। लेकिन यह मेला गंगा जैसी किसी नदी के तट पर नहीं होता, जो परंपरागत रूप से आर्यावर्त की चिन्ह है।

दो नदियों के संगम को प्रयाग कहते हैं। उत्तराखंड में पांच प्रयाग हैं, जहाँ अलकनंदा नदी हिमालय से आने वाले प्रवाहों से जुड़ती है। अंतिम प्रवाह देवप्रयाग में जुड़ने वाली भागीरथी नदी है। यहाँ से मुख्य नदी गंगा कहलाती है। हरिद्वार पवित्र जगह है क्योंकि वहाँ गंगा नदी पहाड़ों से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। शुरू में ‘कुम्भ मेला’ हर बारह वर्ष हरिद्वार में होने वाले केवल इस जमाव को कहते थे जब बृहस्पति ग्रह कुम्भ राशि में प्रवेश करता था। हर 144 वर्ष (12X12=144), उसे महा कुम्भ मेला कहा जाता था।

किसी समय हरिद्वार को गंगाद्वार कहा जाता था। महाभारत के अनुसार वैदिक पुजारी, दक्ष और नागा साधुओं के राख में लिपटें देवता, शिव सबसे पहले यहाँ आमने-सामने आए थे। बाद में हरिद्वार क्षीरसागर के मंथन से निकलने वाले अमृत का प्रतीक बन गया। समुद्र मंथन की कथा वेदों में नहीं बल्कि केवल महाभारत में पाई जाती है। महाभारत में ही ऋगवेद के बृहस्पति ऋषि को जुपिटर ग्रह से जोड़ा गया है।

हरिद्वार के दक्षिण की ओर, जहाँ यमुना और गंगा नदियां मिलती हैं, हर वर्ष माघ मेला आयोजित किया जाता था। यह मकर संक्रांति के अगले महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय होता था। इस काल के जैन तीर्थंकर, ऋषभ नाथ, ने अपना पहला प्रवचन, समवसरण, भी इसी स्थल पर दिया था। यह स्थल बुद्ध के पहले प्रवचन से भी जुड़ा है। समय के साथ माघ मेला, जो बृहस्पति ग्रह के ऋषभ राशि में प्रवेश करने पर आयोजित किया जाता था, महत्त्वपूर्ण बन गया। उसे दूसरा कुम्भ मेला 1857 के बाद ही कहा जाने लगा।

इससे भी दक्षिण की ओर, मालवा पठार पर, शिप्रा नदी के तट पर, उज्जैन नगर स्थित है। शिप्रा नदी स्वयं चंबल नदी की उप-नदी है, जो उत्तर में बहकर गंगा नदी से मिलती है। उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर है और इस स्थल से कर्करेखा जाती है। यह माना जाता था कि इस रेखा के उत्तर में स्थित क्षेत्र आर्यावर्त था, क्योंकि उसके दक्षिण में वर्ष के कुछ दिनों पर परछाई दक्षिण पर पड़ती थी। आर्यावर्त में परछाई हमेशा उत्तर में पड़ती है।

विंध्य पर्वत के पार, गोदावरी नदी के तट पर त्रिम्बकेश्वर मंदिर है। यह कर्करेखा और फलस्वरूप मूल आर्यावर्त के बहुत नीचे है। जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन और नाशिक दोनों में कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है। लेकिन इस मेले का परंपरागत नाम सिंहस्थ है। सूर्य का स्थान निर्धारित करता है कि मेला इन दो जगहों में से कहा होगा: जब सूर्य कर्क राशि में होता है, तब मेला नाशिक में होता है; जब सूर्य मेष राशि में होता है तब मेला उज्जैन में होता है। यह मेले लगभग ग्रीष्म अयनांत और वसंत विषुव के समय होते हैं।

हम पाते हैं कि ये मेले नदियों, नक्षत्रों और ग्रहों से जुड़ें हैं। वे शिशिर अयनांत, वसंत विषुव और ग्रीष्म अयनांत के निकट होते हैं न की कभी शरद विषुव के निकट। इस प्रकार, वर्ष का उज्ज्वल आधा भाग देवों से जुड़ा है। 500CE में, उत्तरायण मकर संक्रांति के समय शुरू होता था, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता था, अर्थात 14 जनवरी को। अब उत्तरायण 22 दिसंबर को शुरू  होता है। तीन सप्ताहों का यह अंतर इसलिए है कि राशिचक्र पर आधारित मूल गणना 500CE में की गई थी। तबसे आज तक राशियां आगे आती गईं हैं। उस समय के खगोलज्ञ यह खगोलीय घटना देख नहीं पाए थे।

वेदों और महाभारत में राशिचक्र का उल्लेख नहीं है। यह धारणा 500CE में भारत में आई और आर्यभट्ट द्वारा उज्जैन में प्रचलित की गई। ब्राह्मणों का उत्तर से दक्षिण भारत तक प्रवसन इसी समय शुरू हुआ था। उस समय गुजरात और ओडिशा में ब्रह्मदेय भूमि अनुदान धीरे-धीरे होने लगें थे। दक्षिण भारत में ये भूमि अनुदान 800CE के बाद ही होने लगें।

इस प्रकार, कुम्भ मेले के सभी स्थल आर्यावर्त से जुड़ें हैं, और कर्करेखा के उत्तर में हैं। सभी गंगा और उसकी उपनदियों से जुड़ें हैं। गोदावरी नदी के तट पर स्थित नाशिक इसका अपवाद है, क्योंकि वह कर्करेखा के दक्षिण में, विंध्य पर्वत श्रृंखला और नर्मदा नदी के भी दक्षिण में स्थित है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यह इसलिए कि नाशिक का कुम्भ मेला केवल 17वीं सदी में मराठा साम्राज्य के उभरने के समय शुरू हुआ, जब वह मुग़लों को चुनौती दे रहा था। फलस्वरूप, इस समय आर्यावर्त की प्राचीन सीमाओं की उपेक्षा की गई और लोगों को कहा गया कि मनुस्मृति के अनुसार आर्यावर्त हिमालय से समुद्र तक फैला था।


Recent Books

  • flowers of india book

    Flower of India: Ways of Seeing the Lotus

    In Flower of India, bestselling author and renowned mythologist Devdutt Pattanaik examines the lotus as one of the most pervasive and resonant symbols of the Indian subcontinent. Through its many avatars—as plant, resource, metaphor, design, and sacred form—he traces how the lotus has shaped India’s cultural imagination across history, religion, art, and everyday life. Concise…

  • astra shastra

    Astra Shastra: Weapons of the Hindu Gods

    Well-known mythologist Devdutt Pattanaik introduces young readers to the wonderful weapons of Hindu gods with his unique art and easy-to-read text…

  • Escape the Bakasura Trap : Let Contentment Fuel Your Growth

    This book re-discovers this path, first revealed by Hanuman in the Mahabharata. Insightful and inspiring, Escape the Bakasura Trap is another classic from one of our great mythologists and thinkers…

  • लंकेश: रावण संग एक रोमांचक यात्रा

    यह पुस्तक भारत के सबसे विख्यात महाकाव्य रामायण और इस कारण भारत के सबसे बड़े खलनायक, रावण, को विस्तार से जानने की राह खोलती है।…

Recent Posts

  • The Chandala in the Vedas

    The Chandala in the Vedas

    The term Chandala, referring to the “lowest of the low” in Brahmin lore, appears a few times in the Vedic literature itself. It is essentially absent from the Rigveda Samhita and emerges only in the later strata of the corpus — the later Samhitas, Brahmanas, and Upanishads. …

  • Who Is Baal?

    Who Is Baal?

    The name Baal has been appearing a lot lately, especially in Western media, in the context of war between Iran and Israel. Known as a false god in the Bible, his images are being burnt in public. Western capitalists are being accused of worshipping him secretly as part of a demon cult. Conspiracy theories aside,…

  • The Convenient Politics of “Later Additions” in the Ramayana

    The Convenient Politics of “Later Additions” in the Ramayana

    When Sita is banished to the forest while pregnant, on the basis of nothing more than public gossip, modern readers recoil. Many quickly reach for a comforting explanation: this episode, they say, is a ‘later addition’, an interpolation, not really part of the original Ramayana…