December 20, 2025

First published June 1, 2025

 in Dainik Bhaskar

हमें करुणामय बनना सिखाती हैं किन्नरों की कहानियां

shikhandi kinnar trans queer

जून महीना इंटरनेशनल प्राइड मंथ के रूप में मनाया जाता है। आइए इस हफ़्ते जानें कैसे भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से लैंगिक अल्पसंख्यकों का उल्लेख हुआ है।

अपने नवग्रह कृति में, कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के 19वीं सदी में जीवित महान संगीतकार, मुथूस्वामी दीक्षितार ने बुध ग्रह को नपुंसकम वर्णित किया, अर्थात जो न पूर्णतः नर है न पूर्णतः मादा है। इस प्रकार, उन्होंने पुराणों में एक कहानी की ओर संकेत किया, जिसमें बृहस्पति ग्रह को पता चला था कि उनकी पत्नी, तारों की देवी, तारा अपने प्रेमी, चंद्र-देव की संतान के साथ गर्भवती थी। बृहस्पति ने उस संतान को श्राप दिया कि वह नपुंसक लिंग का बनकर जन्म लेगा। इस संतान का नाम बुध था। आगे जाकर बुध ने इला से विवाह किया। इला एक पुरुष था जो अनजाने में एक जादुई बाग में जाने पर महिला बन गया था। उनके मिलन से राजाओं का चंद्र-वंश उत्पन्न हुआ। इसका उल्लेख महाभारत में है।

इला की कहानी जैसे, भारत में कई कहानियां हैं जिनमें लोगों ने अपना लिंग बदला। नारद एक तालाब में गिरने पर स्त्री में बदल गए और माया का अर्थ समझ गए। शिव यमुना में स्नान कर गोपी बन गए ताकि वे कृष्ण के साथ रास-लीला में भाग ले सकें। वृंदावन में गोपेश्वरजी का मंदिर इसी कहानी पर आधारित है।

अहमदाबाद से कुछ दूरी पर बहुचरा माता का मंदिर है, जो मुर्गे पर सवार होती हैं। यह मान्यता है कि किसी समय वहां एक तालाब हुआ करता था जो स्त्री को पुरुष में, घोड़ी को घोड़े में और मादा कुकुर को नर कुकुर में बदल देता था। हालाँकि यह तालाब अब सूख गया है, महिलाएं आज भी इस मंदिर में जाकर बालक की मांग करती हैं। वहां वे भगत (जिन्हें कुछ लोग किन्नर कहते हैं) से आशीर्वाद मांगती हैं। भगत पुरुष होते हैं, लेकिन मानते हैं कि वे महिलाएं हैं और इसलिए जीवनभर साड़ी पहनते हैं।

पोंडिचेरी के पास, कूवगम गांव में, विपरीतलैंगिक अली समाज हर वर्ष एक ऐसी घटना मनाता है जिसका उल्लेख महाभारत में हुआ था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों की जीत सुनिश्चित करने के लिए अर्जुन और उनकी नाग पत्नी, उलूपी के पुत्र, अरावन की बलि चढ़ाई जाना आवश्यक था। अरावन विवाह किए बिना मरना नहीं चाहता था। लेकिन कोई महिला भी ऐसे किसी पुरुष से विवाह नहीं करना चाहती थी जिसकी मृत्यु अगले दिन निश्चित थी। इसलिए, कृष्ण ने मोहिनी का रूप लेकर अरावन के साथ एक रात बिताई और अगले दिन उसकी मृत्यु का शोक मनाया।

कृत्तिवास रामायण में दो विधवाओं की कहानी है, जिन्होंने एक जादुई द्रव्य पीकर संभोग किया था। इससे बिना हड्डियों वाली संतान ने जन्म लिया (परंपरागत समझ यह है कि हड्डियां वीर्य से बनती हैं)।

इन कहानियों का क्या अर्थ निकाला जाए? क्या ये समलैंगिकों की कहानियां हैं? इन कहानियों ने निश्चित ही लिंग और कामुकता की परंपरागत समझ को उथल-पुथल कर दिया। प्राचीन भारत में लेखकों और कवियों ने निस्संदेह ही एक ऐसी स्थिति कल्पित की थी जहां पुरुषत्व और स्त्रीत्व में भेद कई बार धुंधला होता था और अदृश्य भी हो जाता था। ये विषय भले ही असहज हों, पर वे ये कहानियां लगातार, बिना किसी लज्जा या अपराधबोध के बताते गए। और इसकी जड़ें हम भारतीय तत्त्वमीमांसा में पाते हैं।

भारतवासियों ने हमेशा से माना है कि हमारी आत्मा पुराने शरीर छोड़ नए शरीर धारण कर पुनर्जन्म लेती रहती है। अपने कर्म के अनुसार हम पेड़, पत्थर, पक्षी, प्राणी, पुरुष, स्त्री, स्त्री बनने के इच्छुक पुरुष, पुरुष बनने की इच्छुक स्त्री, देवता या दानव के रूप में भी जन्म ले सकते हैं। इस अनंत ब्रह्मांड में संभावनाएं भी अनगिनत हैं। ज्ञानी व्यक्ति जानते हैं कि पुरुषत्व और स्त्रीत्व लिंगहीन आत्मा को ढकने वाली मात्र चादर जैसे हैं। यह आवश्यक है कि हम शरीर से न जुड़ें बल्कि उसके सामर्थ्य को मनाए और उसकी सीमाओं को जानकर अंततः उनके पार जाए।

तो प्रश्न यह है कि क्या हममें उन लैंगिक और कामुक अस्पष्टताओं को समाहित करने की करुणा है जो सभ्य मानव समाज में उपस्थित होती हैं? मैं समझता हूं हममें वह करुणा है। प्रत्येक युग में नए नियम जन्म लेकर विश्व व्यवस्था को नया आकार देते हैं। महाभारत में एक ऐसे युग का उल्लेख है जिसमें विवाह नहीं होते थे। फिर, श्वेतकेतु ने विवाह के नियम स्थापित कर यह व्यवस्था बदल दी। हम एक ऐसे युग में से जीए हैं जिसमें हमने लैंगिक अल्पसंख्यकों को अमानवीय और अमान्य करने वाले औपनिवेशिक नियमों का विरोध नहीं किया। अब, इसकी भरपाई करने का समय आ गया है।


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