अगले दो लेखों के माध्यम से हम आधुनिक कर्णाटक राज्य के क्षेत्र के पिछली तीन सहस्त्राब्दियों के इतिहास के बारे में जानेंगे।
एक किंवदंती के अनुसार, लगभग 700 वर्ष पहले, इस क्षेत्र में, तुंगभद्रा नदी के तट पर, हरिहर और बुक्का नामक भाइयों ने एक विचित्र दृश्य देखा: श्वानों द्वारा शिकार किए जा रहें ख़रगोश उल्टा श्वानों पर वार कर रहें थे। वे समझ गए कि उस भूमि में विरोध करने की प्रवृत्ति थी। इसलिए, उन्होंने वहाँ विजयनगर नामक शहर स्थापित किया। आगे जाकर इस शहर ने अधिकांश उत्तर भारत को वश में करने वाले ‘तुर्कु धर्म’ के दक्षिणी बढ़ाव का विरोध किया। उत्तरकालीन किंवदंतियों के अनुसार, हरिहर और बुक्का ने श्रृंगेरी मठ के प्रमुख, विद्यारण्य, से प्रेरित होकर विजयनगर की स्थापना की थी। कहते हैं कि श्रृंगेरी मठ के संस्थापक, आदि शंकराचार्य, ने 1300 वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाया था कि ‘हिंदू धर्म’ को चुनौती देने वाला धर्म भारत आता।
आज, हम्पी के निकट विजयनगर के मात्र खंडहर बचे हैं। विजयनगर 14वीं और 16वीं सदियों के बीच पनपा। इस शहर में विशाल चट्टानें बिखरी हुईं हैं। कहते हैं कि श्री राम की वानर सेना ने रावण की लंका तक राम-सेतु इन्हीं चट्टानों से बनाया था। इस क्षेत्र में पहाड़ किष्किंधा के वन से जुड़ें हैं, जहाँ हनुमान, सुग्रीव और वाली निवास करते थे। इतिहासकारों का मानना है कि भारत के क्षेत्रों को रामायण के साथ जोड़ा जाना लगभग 1000 वर्ष पहले तमिल रामायण की रचना के बाद ही शुरू हुआ। इसलिए, राम राज्य स्थापित करने के इच्छुक हरिहर और बुक्का ने विजयनगर की स्थापना से इसी बात की पुष्टि की।
संभवतः विजयनगर साम्राज्य कर्णाटक राज्य कहलाया होगा और वह दक्खन के क्षेत्र और तमिल-भाषी क्षेत्र के बीच स्थित था। ध्यान रहें कि कर्णाटक यह नाम आधुनिक भारत के कर्णाटक राज्य के नाम से अलग है। पहले, कर्णाटक यह शब्द संपूर्ण दक्खन के क्षेत्र को संबोधित करता था, जो पश्चिम में सह्याद्रि पर्वत और पूर्व में कोरोमंडल समुद्रतट के बीच स्थित था। काले रंग की मिट्टी वाला यह क्षेत्र कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों और उनकी कई उपनदियों से सिंचित था। यह संभव है कि कर्णाटक शब्द ‘कारू’ अर्थात काला, ‘कारा’ अर्थात ऊंचा और ‘नाडु’ अर्थात क्षेत्र इन शब्दों से बना है।
आधुनिक कर्णाटक राज्य के तीन क्षेत्र हैं: तटवर्ती क्षेत्र, जहाँ कदम्ब राजाओं का वर्चस्व था और जो अरब सागर से व्यापार करता था; उत्तर में स्थित सूखा, समतल क्षेत्र, जो पूर्व की ओर उतरता है, जहाँ भीमा और कृष्णा नदियां बहती हैं और जहाँ चालुक्य राजा राज किया करते थे; और दक्षिण में स्थित असमतल, मैसूर का क्षेत्र, जहाँ गंग राजा राज किया करते थे।
उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों के बीच तुंगभद्रा नदी बहती है। सम्राट अशोक का साम्राज्य इस नदी के उत्तर तक सीमित था। 2000 वर्ष से भी पहले, अशोक ने उत्तरी क्षेत्र में आदेशपत्र और बौद्ध स्तूप स्थापित किए, जबकि दक्षिणी क्षेत्र में जैन मठ उभरें। विजयनगर की स्थापना से पूर्व, पहले राष्ट्रकूट और फिर होयसल राजवंशों ने इस नदी के दोनों ओर के क्षेत्र पर राज किया।
लेकिन दिल्ली की सल्तनत ने भी केवल दक्खन के उत्तरी भाग पर नियंत्रण किया। और 500 वर्ष पहले, विजयनगर के काल में, उत्तरी भाग पर बिदार, बेरार और बीजापुर के दक्खनी सुल्तानों का राज था, जो बहामनी सल्तनत से अलग हुए थे। स्वयं बहामनी सल्तनत दिल्ली की सल्तनत से अलग हुई थी। स्पष्टतया, आधुनिक कर्णाटक राज्य के उत्तरी और दक्षिणी भागों में संस्कृति बहुत अलग थी, क्योंकि वहाँ का भूभाग अलग होने के सहित वहाँ अलग राजवंशों का भी राज था।
संभवतः, लगभग 500CE के आस-पास दक्खन के क्षेत्र के कई समुदायों ने कन्नड भाषा का प्राचीन रूप बोला होगा। लगभग 1000CE तक, इस क्षेत्र में और भाषाएँ उभरीं थी: इसके उत्तर में मराठी भाषा, जहाँ गोदावरी नदी बहती थी, गोदावरी और कृष्णा नदियों के मुखों के क्षेत्र में तेलुगु भाषा, पश्चिमी समुद्रतट पर कोंकणी भाषा और दक्षिण की ओर तुलु और मलयालम भाषाएँ।
शुरू में विजयनगर साम्राज्य में कन्नड प्रमुख भाषा थी। लेकिन, जब कृष्णदेवराय ने ओडिशा के गजपति राजाओं को पराजित कर समृद्ध, कृषिक तेलुगु-भाषी क्षेत्रों पर नियंत्रण पा लिया, तब तेलुगु विजयनगर की प्रमुख भाषा बन गई। आज भी कन्नड और तेलुगु विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि विजयनगर साम्राज्य का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में संक्सृत भाषा केवल कुलीन ब्राह्मण वर्ग ही बोला करता था। वह शासकीय भाषा न होते हुए उसका धार्मिक अनुष्ठानों में और राजाओं तथा विद्वानों द्वारा प्रयोग किया गया।
अगले लेख में हम हम यह चर्चा जारी रखते हुए कर्णाटक राज्य के अन्य राजवंशों के बारे में जानेंगे।











