आइए कुम्भ मेले पर हमारी बातें जारी रखते हैं।
कुम्भ मेले का अमृत के ‘कुम्भ’ के साथ संबंध केवल हाल ही में प्रचलित किया गया है। अब, राशिचक्र के बजाय कुम्भ देवों और असुरों द्वारा किए गए क्षीरसागर के मंथन से उभरने वाले अमृत को उल्लिखित करता है। कहते हैं कि अमृत के बूंद इन तीर्थस्थलों में गिर गए और सूर्य, चंद्र और गुरु ग्रह के चलन अनुसार वे विशिष्ट समय पर सक्रिय बनते हैं।
समुद्रमंथन की कथा वेदों से नहीं बल्कि महाभारत से आई है। उसकी छवियाँ भारत में नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाईं जाती हैं। वेदों में उल्लेख है कैसे एक बाज मनु तक सोम ले गया और कैसे मनु ने इंद्र के लिए सोमरस बनाया। प्राचीन ग्रंथों में समुद्रमंथन का उल्लेख नहीं है।
उपनिवेशिक काल से इन मेंलों की हिंदू पहचान स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। और यही कारण है कि आधुनिक काल में भी राजनीतिज्ञ उन्हें इतना बढ़ावा देते हैं। इन मेलों में पर्यटक करोड़ों में जाते हैं ताकि वे साधुओं को हिंदू बल का प्रदर्शन करते हुए देख सकें। नग्न साधुओं के अखाड़ें और कुछ साल पहले स्थापित किए गए किन्नर अखाड़े के बारे में सभी जानते हैं। लेकिन महिलाओं के अखाड़े की बात कोई नहीं करता। कुछ वर्ष पहले उसे स्थापित करने के प्रयास को दबाया गया था।
बौद्ध और जैन धर्मों की तरह हिंदू धर्म में भी मठों पर पुरुषों का ही नियंत्रण है। मठवासिनियों का कम दर्जा होता है, जिनमेंसे अधिकतर परित्यक्त विधवाएं होती हैं। इन मठों में यह विश्वास होता है कि महिलाओं में रजोधर्म होने के कारण जादुई शक्ति नहीं होती है, जबकि पुरुषों में ब्रह्मचर्य के कारण यह शक्ति होती है। इसलिए, सबसे पहले पानी में स्नान तपस्वियों को करने कहा जाता है ताकि वह उनकी शक्ति से प्रबल बन सके। ब्रह्मचर्य के कारण पुरुषों में सिद्धि शक्तियां निर्माण होती हैं इस विचार की तांत्रिक जड़ें हैं और इसलिए वह शिव तथा हनुमान से जुड़ा है।
इन मेलों का एक विशिष्ट उत्तर भारतीय स्वरुप है। उत्तर भारतीय शायद ही दक्षिण भारत में कुम्भकोणम के मेले के बारे में जानते होंगे। कर्क रेखा के दक्षिण के भाग को दक्षिण भारत माना गया। परंपरागत रूप से इस रेखा के उत्तर में स्थित क्षेत्र को आर्य-वर्त माना जाता था, जहाँ परछाई हमेशा उत्तर की ओर पड़ती है। 500CE के बाद मनुस्मृति सहित अन्य ग्रंथों ने दक्षिण के भाग का भी आर्य-वर्त में समावेश किया और वह हिमालय की श्रृंखला से लेकर समुद्र तक फैल गया। कथाओं के अनुसार ऋषियों ने अपने साथ पहाड़ और नदियां ले जाकर दक्षिण की ओर यात्रा की। सप्त-सिंधु न केवल सिंधु, गंगा और उनकी उप-नदियां थी बल्कि अब उसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों का समावेश भी किया गया।
कुम्भ मेले से स्पष्ट है कि हिंदू धर्म में परंपरा अनुसार अनुष्ठान करना आस्था से अधिक महत्त्वपूर्ण है। सही समय पर जल में डुबकी लगाना महत्त्वपूर्ण है ताकि आस्था की घोषणा की जा सकें। इसके कारण, व्याख्याएं और उससे जुड़ीं कथाएं बाद में आते हैं।
मठवासी और राजा इन मेलों में मिलकर अपने मतभेद सुलझाते थे और अपने उत्तराधिकारी चुनते थे। मठवासी परंपराएं समतावादी नहीं होती हैं। उनमें राजनीतिक और आर्थिक शक्ति होने के कारण मंडलेश्वर और महा-मंडलेश्वर जैसे वर्गीकरण होते हैं। ये वर्गीकरण राजा तथा महाराजा और राणा तथा महाराणा के वर्गीकरणों जैसे होते हैं। इसलिए, विशेषतः 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ इन मेलों को लेकर चिंतित हुए। थे कि 1857 के विद्रोह जैसे और एक विद्रोह हो। लेकिन मठवासियों ने दावा किया कि इन मेलों का राजनीति से कोई-लेना देना नहीं था और वे केवल धार्मिक थे। इस प्रकार, अंग्रेज़ अधिकारियों के विरोध और उनके कई प्रयासों के बावजूद वे होते गए और रेल सेवाओं और समाचार पत्रों के आने से बढ़ते गए।
इस प्रकार, कुम्भ मेले आकाशीय संरेखण, नदियों के संगम और मठवासियों के सम्मिलित होने से जुड़ें हैं। क्या उनमें भाग लेने से अमरत्व प्रदान होता है? संभवतः राजनीतिज्ञ वह चाहते हों, लेकिन प्रकृति को उसपर हंसी आती है।











