October 30, 2025

First published September 21, 2025

 in Dainik Bhaskar

जानें मंदिरों को रथ और विमान कहने के पीछे क्या रहस्य है

temple

आज हिंदू धर्म की सबसे दृश्य पहचान उसके मंदिर हैं। आइए अगले दो लेखों में जानते हैं कि मंदिरों की उत्पत्ति कैसे हुई और वे कैसे विकसित होते गए।

अधिकाँश भारतवासी यह सुनकर चौंक जाते हैं कि भारत में मंदिर निर्माण इतना पुराना नहीं है। ध्यान रहें कि हमारा धार्मिक इतिहास कम से कम 4000 वर्ष पुराना है। अतः, हम पिछले 1500 वर्षों से मंदिर बनाते आए हैं।

3000 BCE में पनपी सिंधु घाटी सभ्यता अपनी अत्युत्तम सड़कों और जल निकास व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस सभ्यता में मंदिर बनाए जाने के अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिलें हैं। उसमें उत्पादन को बहुत महत्त्व दिया गया। यही कारण है कि इस सभ्यता के लिए संघटन, मानकीकरण और आयोजन बहुत महत्त्वपूर्ण थे। यदि हम मिस्र तथा मेसोपोटामिया की समकालीन सभ्यताओं से तुलना करें तो सिंधु घाटी सभ्यता में कला और आध्यात्मिकता को बहुत कम महत्त्व दिया गया।

सिंधु घाटी में पाए गए कुछ मुहरों से विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि इन लोगों की आध्यात्मिक और रहस्यात्मक सोच रही होगी। लेकिन इस प्रकार के मुहर दुर्लभ हैं। यहाँ अग्नि वेदियाँ, शिश्न जैसे दिखने वाले पत्थर, गर्भनुमा कलाकृतियाँ और स्वस्तिक के चिन्ह पाए गए हैं। इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि इस संस्कृति में शहरों का आयोजन पवित्र संरचनाओं के निर्माण से अधिक महत्त्वपूर्ण था।

वैदिक काल लगभग 1500 BCE में पनपा। इस काल में यज्ञ सबसे महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान था। यजमान ईंटों से बनी वेदी में अग्नि जलाकर मंत्र जपते हुए अग्नि में चढ़ाव देते थे। यज्ञ के लिए किसी स्थायी संरचना की आवश्यकता नहीं होती थी, बल्कि यज्ञ कहीं भी किया जा सकता था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आर्य वास्तव में किसी एक जगह बसते नहीं थे। और वैदिक मंत्रों से स्पष्ट है कि आर्यों ने अपनी आध्यात्मिक पहचान स्थापित करने के लिए मंदिर बनाना आवश्यक नहीं समझा।

तो फिर भारत में मंदिर बनाने का विचार कहाँ से आया? एक विचारधारा के अनुसार भारत में मंदिर प्राचीन काल से ही रहें हैं और एक लंबी अवधि के बाद उन्होंने विशाल रूप लिया। प्रारंभिक मंदिर मात्र चट्टान और गुफ़ाएं होते थे, जैसे जम्मू में वैष्णो देवी का मंदिर, या फिर झीले, झरने, नदियों के तीर्थ या उनके संगम। लोग इन गुफ़ाओं, पेड़ों और झीलों में रहने वाली जंगली आत्माओं अर्थात यक्षों की पूजा की। उन्हें भोजन और वस्त्र अर्पण किए गए और उनके सामने अगरबत्ती और दिए जलाए गए। संभवतः ये मंदिर खानाबदोश पशुपालकों ने नहीं बल्कि किसानों ने बनाए, जो स्थायी जीवन जीते थे। समय के साथ पशुपालक स्थायी समुदायों के साथ मिलने-जुलने लगें और मंदिरों का महत्त्व बढ़ने लगा।

दूसरी विचारधारा के अनुसार खानाबदोश आर्यों के वास्तव में मंदिर हुआ करते थे, जिन्हें वे पशुपालकों की बैल गाड़ियों पर बिठाते थे। पशुपालक जहाँ भी जाते वहाँ वे इन मंदिरों को ले जाते थे। यही कारण है कि कई सदियों बाद पत्थर से बने विशाल मंदिरों को रथ कहा गया। इन मंदिरों की दीवारों पर पहियों का प्रमुख स्थान है और देवताओं को रथों में बिठाकर उन्हें सवारी पर ले जाना भी एक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान होता है। चेन्नई के पास महाबलीपुरम में विख्यात पंच रथ मंदिर परिसर में रथ के आकार की पांच अलग-अलग इमारतें हैं। प्रत्येक रथ एक ही पत्थर से उकेरा गया है।

मंदिरों को विमान भी कहा जाता है। इसलिए, कुछ लोगों का मानना है कि वैदिक देवता वास्तव में एलियन थे जो फ़्लाइंग सौसर में यात्रा करते थे। वे यह भी मानते हैं कि ये मंदिर इन फ़्लाइंग सौसर की पत्थर में उकेरी गईं प्रतिमाएं हैं और मंदिर उस जगह बनाए गए जहाँ कभी ये विमान धरती पर उतरे थे।

जैसे आधुनिक विवाह मंडपों के साथ होता है वैसे वैदिक काल में भी त्यौहारों और समारोहों के समय संरचनाएं खड़ी की जाती थी और त्यौहार खत्म होते ही वे तोड़ी जाती थी। दुर्गा पूजा और गणेश चतुर्थी के त्यौहारों में यह प्रथा आज भी देखी जाती है। बांस और घास से अस्थायी मंदिर और मिट्टी से मूर्तियां बनाईं जाती हैं। त्यौहार के अंत में, मूर्तियों का पानी में विसर्जन किया जाता है और उस संरचना को जलाया जाता है। इस प्रकार, न मंदिर न उसके भीतर के देवता का कोई निशान बचता है। हिंदू धर्म में स्थायी मंदिर बहुत बाद बनाए जाने लगें, संभवतः यूनानी प्रभाव के कारण।

अगले लेख में हम हिंदू मंदिरों पर बौद्ध धर्म और यूनानियों के प्रभाव के बारे में जानेंगे।


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