January 20, 2026

First published December 14, 2025

 in Dainik Bhaskar

सुवर्णभूमि पहुँचकर जानें कैसे बदला हिंदू धर्म

kalash pot ceremonial hinduism

पिछले सप्ताह हमने जाना कैसे बैंगकॉक में ब्रह्मा देवता को पूजा जाता है। आज इस चर्चा को जारी रखते हुए हम जानेंगे कैसे हिंदू धर्म थाईलैंड पहुंचा और उसने क्या रूप लिया।

एरावान आने वाले श्रद्धालु जल्द ही समझ गए कि ये ब्रह्मा देवता बहुत शक्तिशाली थे। इसलिए, वे नियमित रूप से तीर्थस्थान आकर अपने व्यक्तिगत या व्यापारी जीवन में समस्याओं के हल की खोज में आने लगें। लगातार आ रहें श्रद्धालुओं के चढ़ाव के कारण हर कुछ घंटे जमा चढ़ाव को वहाँ से हटाकर आने वाले चढ़ाव के लिए जगह बनाई जाती है।

समय-समय पर आस-पास के अस्पताल और होटल इस तीर्थस्थान में स्थित गजों की लकड़ी की किसी एक विशाल मूर्ति को अपने अहाते में रखने की इच्छा व्यक्त करते हैं। उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी अनुमति दी जाती है, क्योंकि यह निश्चित है कि एरावान के तीर्थस्थान से आए गज का आदर किया जाएगा और उसे प्रतिदिन गेंदे के फूलों की माला चढ़ाई जाएगी। श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होने पर वे तीर्थस्थान जाकर दो, चार, छह या आठ नर्तकियों से देवता की प्रशंसा में गीत गँवाते हैं।

हर दिन ताइवान, सिंगापुर और हॉंग कॉंग से सैंकड़ों पर्यटक बैंगकॉक की सैर करते हुए इस तीर्थस्थान को भेंट देकर अपने व्यवसाय में सौभाग्य की प्रार्थना करते हैं। श्रद्धालु ध्यानपूर्वक अपने लिए केवल वह मांगते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है न कि जो उन्हें चाहिए। अर्थात उनकी मांग लोभ से प्रेरित नहीं होती है।

एक आख्यानशास्त्री होने के नाते मुझे यह बात सबसे रोचक लगी कि यह तीर्थस्थान और उसके पास विकसित हुई संस्कृति मिथोपोएसिस अर्थात प्रथाओं और मान्यताओं का समय और जगह के साथ परिवर्तन का आदर्श उदाहरण था।

बौद्ध धर्म की तरह हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद (जिसे थाई लोग ब्रह्मा का धर्म मानते हैं) भी लगभग 1000 वर्ष पहले थाईलैंड पहुँचा। भारत के पूर्वी समुद्रतट के चोल और गंग राजवंशों के संरक्षण के तहत भारतीय व्यापारी और शिल्पकार अक्सर दक्षिणपूर्वी एशिया जाते थे। इस काल के बाद, मध्य युग में, समुद्री यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया, क्योंकि यह माना जाने लगा कि समुद्री यात्रा से जाति के विशेषाधिकार चले जाते हैं। फिर, भारत से हो रहा समुद्री व्यापार पहले अरब और अंततः यूरोपीय व्यापारियों के हाथों चला गया।

समय के साथ ये व्यापारी तथा शिल्पकार समुद्र के पार सुवर्ण भूमि में बसने लगें और उनके साथ हिंदू देवता भी इस भूमि तक पहुँच गए। विष्णु राजपरिवारों के पसंदीदा देवता बन गए, जो आज भी देखा जाता है। ब्रह्मा पुजारी वर्ग के पसंदीदा देवता बन गए। और गर्भवती बनने की इच्छुक महिलाओं ने शिव को पूजना शुरू किया।

अगली कुछ सदियों में थाईलैंड के हिंदू धर्म ने एक स्वतंत्र रूप ले लिया। कुछ प्रथाएं, जिनका भारत में पालन रुक गया था — जैसे मंदिर की नर्तकियां — थाईलैंड में बनी रहीं। देवता आपस में घुल-मिलकर एक हो गए। फलस्वरूप, मुझे बैंगकॉक के ब्रह्मा पुराणों के इंद्र के समान लगें, जिन्हें नर्तकियां पसंद थीं, जो गजों पर सवार होते थे और जो वर्षा तथा सौभाग्य लाते थे। ये दो देवता, जो अब भारत में लोकप्रिय हिंदू कहानियों का हिस्सा नहीं रहें, वे थान ताओ महाप्रोम के माध्यम से पनपें हैं। बैंगकॉक में ब्रह्मा अब हंस की सवारी नहीं करते हैं (हालाँकि मैंने कुछ मंदिरों में यह अवश्य देखा)। जैसे इंद्र का वाहन ऐरावत होता था वैसे ब्रह्मा भी एरावान नामक कई सिर वाले गज पर सवार दिखाई दिए।

कई विद्वान इस बात पर वाद-विवाद करते हैं कि क्या थाईलैंड का हिंदू धर्म हिंदू धर्म न होते हुए केवल वहाँ का दूषित रूप है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि हिंदू धर्म का कोई ‘मूल’ रूप है। क्या है यह ‘मूल’ हिंदू धर्म? क्या वह वैदिक हिंदू धर्म है? क्या वह ब्राह्मणवाद है – जिसने जाति व्यवस्था को स्वीकारा? क्या वह वो धर्म है जिसमें पौराणिक देवता पूजे जाते हैं? क्या वह भक्ति परंपरा का हिंदू धर्म है? क्या मंदिरों में की गई मूर्तिपूजा हिंदू धर्म है? या क्या ‘निराकार’ हिंदू धर्म ‘मूल’ हिंदू धर्म है, जिसके कारण 19वीं सदी में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज की स्थापना हुई थी?

सच तो यह है कि धर्म भी समय और जगह के साथ बदलते हैं। लोग भी उनमें बदलाव लाते हैं। इसलिए, धर्म की धारणा और प्रथा जो भी हो, वह उस समय, काल और व्यक्ति के लिए वैध होती है।


Recent Books

Recent Posts