February 9, 2026

First published March 16, 2025

 in Dainik Bhaskar

शिव मंदिर में नंदी का महत्त्व

Shiva Nataraja Dance

बहुधा वृद्ध पीढ़ी यह बहाना बनाकर युवा पीढ़ी से जानकारी छिपाए रखती है कि लोग लज्जित होंगे। यह वर्तमान और भविष्य की युवा पीढ़ियों के विरुद्ध किया गया अपराध है।

इसी संदर्भ में बात करनी हो, तो शहर वासी गाय, सांड और बैल के बारे में इतना नहीं जानते हैं। यह त्रासदी है क्योंकि इससे आध्यात्मिकता की उनकी समझ अधूरी रह जाती है। आइए आज के लेख में शिव के वाहन, नंदी, के माध्यम से इनमें अंतर समझें।

कुछ दिन पहले मैं एक नए शिव मंदिर गया था। इस मंदिर का निर्माता मुझे गर्व से मंदिर की विशेषता दिखा रहा था: शिव के वाहन, नंदी, की विशाल मूर्ति जो आँगन में मुख्य मंदिर की ओर मुँह किए खड़ी थी। कॉन्क्रीट की बनी यह मूर्ति मोहक थी। उसके चारों ओर चलकर मैंने उस व्यक्ति से पूछा, “क्या यह मूर्ति वृषभ अर्थात सांड की है या बैल की है?” “यह नंदी की मूर्ति है,” उसने उत्तर दिया। इसलिए, मैंने स्पष्ट करते हुए पूछा, “क्या नंदी सांड है या बैल?” वह मेरे प्रश्न से चकरा गया। मैं समझ गया कि वह सांड और बैल में अंतर नहीं जानता था। मुझे इससे कोई अचरज नहीं हुआ क्योंकि वह शहर में पला-बढ़ा था। फलस्वरूप, वह पशुपालन की प्रथाएं नहीं जानता था।

मैंने उससे यह प्रश्न इसलिए पूछा था कि उस विशाल नंदी के पीछे की ओर वीर्यकोष दिखाई नहीं दे रहा था। किसी भी परंपरागत शिव मंदिर में, लोग बहुधा नंदी के शरीर में इस भाग को दिए गए प्राधान्य को देखकर चकित रह जाते हैं। कुछ श्रद्धालु और मंदिर के पुजारी भी उसे स्पर्श करने के बाद ही शिव मंदिर में प्रवेश करते हैं। आधुनिक मंदिर कॉन्क्रीट, संगमरमर और प्लास्टर ऑफ़ पैरिस से बनाईं इन मूर्तियों में बहुधा उसे दिखाने में संकोच करते हैं। एक मूर्तिकार ने मुझे कहा था कि यह इसलिए है कि लोग उसे देखने से शर्माते हैं और उन्हें वह बहुत अश्लील लगता है। उसने कहा कि कुछ लोग यह समझकर भी भूल कर बैठते हैं कि नंदी गाय है।

हम अत्यधिक लज्जालु होते जा रहें हैं। और लज्जालुता के साथ यदि हम अज्ञात रहें तो वह जोखिमभरा हो सकता है। नंदी के शरीर का यह भाग दिखाना अत्यावश्यक है। इसका उद्देश्य लोगों को उत्तेजित करना नहीं है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि नंदी नर है न कि मादा और यह कि बैल के विपरीत वह सांड है, अर्थात उसके वीर्यकोष की बलि नहीं दी गई है। इसका अर्थ यह है कि वह पालतू नहीं है। इसलिए, उसका हल चलाने या बैलगाड़ी खींचने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है। वह लद्दू प्राणी नहीं है। नंदी को अपने इस भाग के बिना दिखाना उसे एक अलग ही पहचान देने समान है।

शिव का वाहन, नंदी, वृषभ अर्थात सांड है न कि बैल। इसके पीछे एक कारण है। सांड जंगली प्राणी है। वह गायों को गर्भवती बना सकता है, जो बैल नहीं कर सकते। और जब तक गाय गर्भवती होकर बछड़े को जन्म नहीं देगी तब तक वह दुधारू नहीं बन सकेगी। इस प्रकार, गाय केवल तब दूध दे पाएगी जब सांड बधिया नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर, पालतू बैल भी आवश्यक है क्योंकि वह खेतों में हल चला सकता है। इस प्रकार, सांड और बैल दोनों आवश्यक हैं। यह धर्म-संकट है, जहाँ हमें स्वायत्तता और पालतू बनाने में संतुलन पाना है। मनुष्य भी इसी धर्म-संकट से जाते हैं – अपनी वृत्ति के अनुसार मुक्त रहें या उत्तरदायित्व का बोझ उठाएं।

साधारणतः, किसान एक या दो सांड को छोड़ अन्य सभी को बधिया कर उन्हें बैल बनाते हैं। नंदी के नाम से जाने जाने वाले इन सांडों को रस्तों में मंदिरों के निकट घूमने दिया जाता है। इन चिड़चिड़े, ख़तरनाक प्राणियों से दूर रहना ही उचित है। संयोग से, स्पेन के मैटडोर इन्हीं सांडों से लड़ते हैं।

हिंदू आख्यान शास्त्र के अनुसार शिव ने विवाह करके गृहस्थ बनने से इनकार किया था। अर्थात, वे पालतू नहीं बनना चाहते थे। लेकिन देवी ने उनसे विनती की कि वे देवी से विवाह करें। जब तक कि शिव देवी के पति बनकर सांसारिक विश्व में भाग नहीं लेंगे, तब तक संतान जन्म नहीं लेंगे और विश्व का निर्माण नहीं होगा।

शिव न चाहते हुए भी मान गए। वे देवी के वर बन गए, लेकिन देवी की गृहस्थी के प्रमुख नहीं बनें। उन्होंने देवी के साथ रहते हुए भी उनका पोषण नहीं किया। उन्होंने संतानों को जन्म देकर भी उनकी देखभाल नहीं की। इसलिए, देवी ने स्वायत्त रूप से विश्व की देखभाल की। उन्होंने विश्व का पोषण किया मानों जैसे गाय हमें दूध देती है। दूसरी ओर, शिव ने विश्व के बंधनों से अलग स्वतंत्र रहना पसंद किया। शिव का यह रूप उनके मंदिरों में नंदी के माध्यम से दिखाया जाता है। अतः, नंदी की मूर्ति का उचित निरूपण अत्यावश्यक है।


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