हमें हमेशा से सिखाया गया है कि पूँजीवाद का आविष्कार युरोप में हुआ था। वास्तव में पूँजीवाद का वर्तमान रूप युरोप में हुई औद्योगिक क्रांति का परिणाम है। इस औद्योगिक क्रांति के पहले, पूँजीवाद उन व्यापारिक मार्गों में पनपा जिनपर अरब व्यापारियों का नियंत्रण था। ये मार्ग दक्षिण-पूर्वी एशिया से लेकर भूमध्यसागर तक फैलें थे। और बग़दाद इस मार्ग पर केंद्रीय शहर था। यह लगभग 1000 वर्ष पहले की बात है।
उससे 1000 वर्ष पहले, विश्वभर के व्यापारिक मार्ग बौद्ध व्यापारी राजाओं के नियंत्रण में थे। यूरोपीय इतिहासकारों ने बौद्ध धर्म के इस पहलु को जानबूझकर छिपाया है। यह इसलिए कि 19वीं सदी से उनका प्रयास बौद्ध धर्म को अतींद्रिय धर्म दिखाने का रहा है। सच बात तो यह है कि विश्वभर में व्यापारिक जाल और बाज़ारों को फैलाने में बौद्ध धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
कहते हैं कि बुद्ध के प्रबोधन प्राप्त करने के बाद उन्हें पहला भोजन दो व्यापारियों ने खिलाया था। दोनों व्यापारी बुद्ध की प्रज्ञा से प्रभावित थे। लेकिन वे साधु नहीं बनना चाहते थे। इसलिए, बुद्ध ने उन्हें अन्य साधुओं की देखभाल करने का सुझाव दिया। बौद्ध आख्यानों के अनुसार, इन व्यापारियों से कहा गया कि मठों और उनमें रहने वाले साधुओं की देखभाल कर बौद्ध सिद्धांत को फैलाने में मदद करने से उन्हें पुण्य मिलता। और इस पुण्य से उन्हें समृद्ध बनने में मदद मिलती। इस प्रकार, बौद्ध संघ की देखभाल कर पुण्य अर्जित करने से व्यापार में सफलता पाई जा सकती थी। बौद्ध पूँजीवाद की जड़ें इसी विचार में हैं।
इन व्यापारियों ने साधुओं के विश्राम के लिए पहाड़ों में गुफ़ाएँ बनाईं तथा स्तूप, चैत्य और विहार खड़े किए। स्तूपों में बुद्ध के अवशेष रखें गए। उनके चारों ओर चैत्य नामक मंदिर बनाए गए। विहारों में साधु रहते थे। व्यापारियों ने मठों को कृषिक भूमि दान में दी। उसपर उगाई फ़सल की बिक्री से मठों की देखभाल की गई। फिर मठों ने विश्वविद्यालय स्थापित किए, जो इन कृषिक अनुदानों की मदद से बनाए गए। व्यापारियों ने अपनी संपत्ति इस शर्त पर दान की कि मठों की देखभाल केवल व्याज से की जाती। इस प्रकार, बौद्ध धर्म में मठों को व्यवहार्य बनाने के लिए विभिन्न वित्तीय लिखितों का आविष्कार किया गया।
शुरू में व्यापारियों ने साधुओं को प्रतिदिन भोजन देकर उनकी सहायता की। फिर, वे उन्हें भूमि दान में देने लगें, जो किराए पर दी जाने लगी। उसपर उगाई फ़सल से प्राप्त धन का मठों की देखभाल में या फिर पूँजी जमा करने में उपयोग किया गया। इस प्रकार, दान की गई भूमि से मिली निधि अक्षय थी। जमा पूँजी से दूसरे व्यापारियों को कर्ज देकर उसपर व्याज कमाया जा सकता था। इस प्रकार, व्याज और किराए के अर्जन से बौद्ध मठ अत्यंत धनवान बन गए।
और यह समृद्धि गंगा के मैदानों से शुरू होती हुई पहले दक्खन के क्षेत्र और फिर आंध्र प्रदेश में अमरावती तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में गन्धार तक फैली। आगे जाकर, वह दक्षिण भारत के अन्य भागों, श्री लंका, थाईलैंड, म्यानमार तथा मलेशिया में और उत्तर में मध्य एशिया और वहाँ से चीन और जापान तक फैली। जहाँ-जहाँ बौद्ध साधुओं ने धम्म के सिद्धांत का प्रचार किया, वहाँ-वहाँ व्यापारिक जाल, वित्तीय जाल और समृद्धि फैलते गए। इस समृद्धि से उत्कृष्ट कला उत्पन्न हुई, जैसे अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और इंडोनेशिया के बोरोबुदुर में विशाल मंदिर परिसर।
कई मायनों में, यह समृद्धि बौद्ध धर्म के अनात्मन सिद्धांत से जुड़ी है। इस सिद्धांत के अनुसार विश्व में कोई आत्मा नहीं होती है। हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि सभी मनुष्यों में एक आत्मा होती है और हमारा कर्म का हिसाब हमें किसी एक जाति में जन्म लेने के लिए विवश करता है।
बौद्ध धर्म में कर्म की समझ थोड़ी अलग थी। उसका मानना था कि चूँकि हम किसी ब्रह्माण्डीय कर्तव्य से नहीं बंधे थे, इसलिए प्रत्येक मनुष्य में उसकी आर्थिक स्थिति सुधारकर सफल व्यापारी बनने का इच्छा-स्वातंत्र्य था। यह करने के लिए उस व्यक्ति को बौद्ध मठों की सहायता करना आवश्यक था। इस प्रकार, कोई दीन व्यक्ति व्यापार के माध्यम से धनवान बन सकता था और यदि वह व्यापार बौद्ध मठों की सहायता करता तो वह और भी पनपता। ऐसी कहानियाँ बौद्ध जातक कथाओं में पाईं जाती हैं, जहाँ भिक्षुक भी नैतिक व्यापार करके और अपने धन से साधुओं की सहायता करके सफल उद्योगपति बन जाते थे।
इतिहासकार बड़ी सहजता से बौद्ध धर्म के इस आर्थिक पहलु को नज़रअंदाज़ करते हैं। इसके बदले वे इस बात पर रोशनी डालना पसंद करते हैं कि बुद्ध जब राजकुमार थे तब उन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग दिया था। पर वास्तव में, बुद्ध ने समृद्धि को बढ़ावा देने वाला विश्व का संभवतः पहला धर्म स्थापित किया था।











