January 30, 2026

First published April 13, 2025

 in Dainik Bhaskar

हिंदू धर्म में पूर्व भारत का योगदान – लेख पहला

lotus

जब-जब हम भारत के हिंदू धर्म की बात करते हैं, तब-तब अधिकांश ध्यान उत्तर भारत और उसके पश्चिम में स्थित राजपूत क्षेत्रों तथा पूर्व में स्थित गंगा नदी के मैदानों को दिया जाता है। इसके बाद ध्यान दक्षिण भारत और आर्य-द्रविडियाई विभाजन की ओर मुड़ता है। पूर्व भारत — गंगा की नदीमुख-भूमि, ब्रह्मपुत्र नदी घाटी और महानदी नदी-क्षेत्र के योगदान का बहुत कम उल्लेख होता है। ऐसा क्यों?

अगले दो लेखों में हम हिंदू धर्म में पूर्व भारत के योगदान के बारे में जानेंगे।

आर्य लोग 3,500 वर्ष पहले उत्तरपश्चिम क्षेत्र से भारत आए। उनके लिए पूर्व दिशा पूज्य थी क्योंकि देवता वहाँ वास करते थे। इसलिए, देवताओं की पवित्र अग्नि सदैव पूर्व दिशा में रखी जाती थी। लगभग इसी प्रवसन के समय भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी भाग में भी एक प्रवसन हुआ। इस प्रवसन का बहुत कम उल्लेख किया जाता है।

इस प्रवसन को ऑस्ट्रो-एशियाटिक प्रवसन कहते हैं। दक्षिणपूर्वी एशिया के लोग म्यांमार और बांग्लादेश से होते हुए भारत आए। वे असम और बंगाल के क्षेत्र से प्रवेश कर बिहार और ओडिशा के क्षेत्र तथा झारखंड और छत्तीसगढ़ के क्षेत्र के जनजातीय क्षेत्र तक पहुंचें। इन प्रवसनों ने मुंडा भाषा को जन्म दिया।

ऋगवेद में कई मुंडा शब्द पाए जाते हैं। उदाहरणार्थ, ‘मा’ एक मुंडा शब्द है जिसका अर्थ चंद्र है। इससे पूर्णि-मा, अ-मा-वस और मास शब्द आते हैं। मुंडा भाषा आई कहाँ से? संभवतः उत्तरपश्चिम से आए आर्य पुरुषों की संतानों ने दक्षिणपूर्व से आए मुंडा पुरुषों की संतानों से विवाह करके इस भाषा को जन्म दिया।

जबकि धान भारत की देशज फ़सल है, धान के नए प्रकार और धान की कृषि के नए तकनीक दक्षिणपूर्वी एशिया से भारत आए। इसके बाद धान हमारे आहार और हमारे अनुष्ठानों का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया। ऋगवेद के अनुष्ठानों में केवल जौ का उल्लेख है। वेदों में धान का उल्लेख केवल यजुर्वेद के अनुष्ठानों से होने लगा।

वैदिक और अ-वैदिक विचारों का मिलन

वैदिक संस्कृति धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैलती गई, यमुना से लेकर गंगा, गोमती और गण्डकी नदियों तक। इसके साथ कुरु, पांचाल और कोसल जैसे कई वैदिक राज्यों ने जन्म लिया। उनमें यज्ञ के अनुष्ठान को महत्त्व दिया गया। यह हम राजा दशरथ की कहानी से देखते हैं जिन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया था।

गण्डकी नदी के पार विदेह, मिथिला और मगध के क्षेत्र थे। यहाँ खेती और उपनिषदों से जुड़ें राजा जनक राज्य करते थे। इस क्षेत्र को आज बिहार कहा जाता है। इसी क्षेत्र में बौद्ध और जैन धर्म जैसी मठवासी परंपराएं पहली बार पनपीं। हम पाते हैं कि यहाँ संन्यासियों को दफ़नाया गया और उनके सम्मान में टीले बनाए गए। रामायण में विश्वामित्र ने मिथिला जाते समय राम को गंगा के अवतरण और पुनर्जन्म की धारणा के बारे में बताया। इस प्रकार, भारत के पूर्वी भाग से पुनर्जन्म, त्याग और मठवासी परंपराओं जैसे अलग प्रकार के धार्मिक विचार आए ।

महाभारत में दीर्घात्मा ऋषि का उल्लेख है। बाली नामक राजा ने उनसे अपनी पत्नी, सुदेशना, को संतान प्रदान करने की विनती की। उनके आशीर्वाद से चार राजकुमार जन्में जो आगे जाकर अंग (बिहार), वांग (बंगाल), पुण्ड्र (बांग्लादेश), ओड्र (उत्तर ओडिशा) और कलिंग (दक्षिण ओडिशा) के राजा बनें।

इससे स्पष्ट है कि वैदिक और अ-वैदिक लोगों का मिलन हुआ। गंगा के मैदानों से पश्चिम की ओर नर्मदा नदी के किनारों से होता हुआ प्रवसन भृगुकच (भरूच) स्थापित करने वाले भृगु ऋषि के नेतृत्व में हुआ था। उसी तरह, दीर्घात्मा ऋषि के नेतृत्व में गंगा के मैदानों से पूर्वी समुद्रतट से होता हुआ प्रवसन हुआ। ये पूर्वी क्षेत्र गजों के लिए प्रसिद्ध थे। गजों की मगध साम्राज्य स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मगध साम्राज्य में मौर्य राजाओं का ऐतिहासिक साम्राज्य और जरासंध तथा नरक राजाओं के पौराणिक राज्यों का समावेश है।

बौद्ध केंद्र

बिहार और बंगाल के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म बहुत पहले से पनपा। पाल राजाओं ने बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया। नालंदा, विक्रमशिला और अन्य विश्वविद्यालय, जहाँ चीन से विद्वान आया करते थे, उन्हें इन राजाओं ने भेंट वस्तुएं दी। चूँकि उन्होंने मगध के क्षेत्र में कई विहार स्थापित किए, इसलिए यह क्षेत्र बिहार कहलाने लगा।

पाल राजाओं के बाद सेन राजाओं ने इस क्षेत्र पर राज किया। वे हिंदू राजा थे। जैन धर्म के भद्रबाहु इसी क्षेत्र से थे। ज्योतिष वराहमिहीर की पुत्री, कान्हा, भी इसी क्षेत्र से थी। वह संभवतः पहली बंगाली कवयित्री थी। उसके प्रतिद्वंद्वियों, संभवतः उसके पिता, पति या ससुर ने उसकी जीभ काट दी थी, इसलिए कि वह उनसे अधिक सटीकता से भविष्यवाणी कर सकती थी।

अगले लेक में हम पूर्व भारत पर यह रोचक चर्चा जारी रखेंगे।


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