पिछले लेख में हमने भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी भाग में हुए ऑस्ट्रो-एशियाटिक प्रवसन और उससे हुए मुंडा भाषा के उगम की बात की। हमने देखा कैसे मुंडा भाषा के कुछ शब्द ऋग्वेद में पाए जाते हैं और कैसे पूर्वी भारत में वैदिक और अ-वैदिक विचारों का मिलन हुआ। अंत में हमने देखा कैसे इस क्षेत्र में बौद्ध और जैन धर्म पनपें। आज के लेख में हम यह चर्चा जारी रखेंगे।
बंगाल में बौद्ध और हिंदू प्रभावों के बहुत पहले भी एक सभ्यता पनप रही थी। उसके चिन्ह पश्चिम बंगाल के चंद्रकेतुगढ़ की टेराकोटा छवियों में मिले हैं, जो दूसरी सदी BCE के शुंग काल तक कालांकित की गईं हैं। यूनान में इस क्षेत्र को गंगादिरई कहा जाता था और वह अपने गजों के लिए प्रसिद्ध था। जबकि धान भारत की देशज फ़सल है, हम जानते हैं कि धान के नए प्रकार और धान की कृषि के नए तकनीक दक्षिणपूर्वी एशिया से भारत तक फैलें।
इससे भी पूर्व की ओर, असम और ब्रह्मपुत्र घाटी का क्षेत्र नरकासुर और बाण नामक असुरों के नियंत्रण में था। ये असुर कृष्ण से लड़ने के लिए जाने जाते हैं। कृष्ण का शत्रु जरासंध मगध का राजा था। इस प्रकार, कृष्ण, जो गंगा घाटी के पश्चिमी भाग में मथुरा के थे, के शत्रु पूर्व में स्थित मगध और कामरूप के थे।
कुछ किंवदंतियों के अनुसार कृष्ण की पत्नी, रुक्मिणी, विदर्भ की नहीं बल्कि अरुणाचल प्रदेश के मिशमी समुदाय की थी। इससे स्पष्ट है कि हिंदू विचार ब्रह्मपुत्र घाटी के पार फैलें थे। कहते हैं कि परशुराम ने अपनी रक्तरंजित कुल्हाड़ी अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी के पानी से धोई थी।
ब्रह्मपुत्र नदी के पार के पहाड़ों में दूर फैली हुईं जनजातियां हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य लोगों से संपर्क करने से पहले वे सदियों से तिब्बती-बर्मी भाषाएं बोलती आईं थी। लोग मानते हैं कि नागालैंड का नागा शब्द पुराणों के नाग जीवों से आया है। लेकिन वास्तव में नागा शब्द ‘ना-का’ से आया है। यह बर्मी भाषा का शब्द है जो छिद्रित कानों में बाली पहनने वाली पहाड़ी जनजातियों का वर्णन करता है।
ओडिशा में वैतरणी नदी बहती है। पुराणों के अनुसार वैतरणी शब्द का अर्थ वह क्षेत्र है जो मृतकों के विश्व को जीवित लोगों के विश्व से अलग करता है। पूर्व में स्थित नदी को यह नाम क्यों दिया गया? इसी नाम की एक नदी महाराष्ट्र में भी है। क्या किसी समय ये नदियां आर्यावर्त की दक्षिणी सीमाएं निर्धारित करती थी? बौद्धयान धर्मशास्त्र में लोगों को कलिंग के क्षेत्र में तीर्थयात्रा पर जाने को छोड़, जाना वर्जित था। स्पष्टतया, उस समय पूर्व में भी कुछ तीर्थस्थल थे। क्या ये बौद्ध, हिंदू या जनजातीय तीर्थस्थल थे? हम नहीं जानते।
इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि कलिंग का क्षेत्र संदेहजनक माना जाता था। सभी सम्राट अशोक के कलिंग पर आक्रमण के बारे में जानते हैं। लेकिन कौन थे कलिंग के निवासी? वे कौनसे धर्म का पालन करते थे? क्या वे व्यापारी थे या किसान? क्या अशोक ने भी दक्षिणपूर्वी एशिया तक समुद्र व्यापार करने का प्रयास किया जो कलिंग के लोग करते आए थे?
इस आक्रमण के कुछ समय बाद कलिंग पर खारवेल नामक राजा ने राज्य किया। ऐसा प्रतीत होता है कि वे जैन साधुओं के प्रशंसक थे। “भारतवर्ष” इस शब्द का पहला प्रयोग उनके द्वारा उदयगिरी गुफ़ाओं के शिलालेखों में पाया जाता है। लेकिन यह शब्द केवल गंगा के मैदानों तक सीमित क्षेत्र को संबोधित करता है। खारवेल ने ड्रामिर (तमिल) राजाओं का पहला उल्लेख भी किया।
ओडिशा के रत्नागिरी में विशाल बौद्ध इमारतें पाईं जाती हैं। आधुनिक काल में उनका महत्त्व कम हो रहा है जबकि समुद्रतट पर स्थित हिंदू मंदिरों का महत्त्व बढ़ रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि 10वीं सदी में तिब्बत तक तांत्रिक बौद्ध धर्म ले जाने वाले पद्मसंभव ओडिशा के थे न कि भारत के उत्तरपश्चिम में गांधार के, जैसे साधारणतः माना जाता है। 10वीं सदी के बाद ओडिशा में हिंदू धर्म ने क्रमशः बौद्ध धर्म की जगह ले ली।
पूर्व भारत की बंगाली, ओड़िया और असमी जैसी मगधीय भाषाओं की कुछ विशेषताएं भारत के अन्य भागों में नहीं देखी जाती। उदाहरणार्थ, इन भाषाओं के व्याकरण में संज्ञाओं में लिंग का भेद नहीं किया जाता है। इसलिए, हम पाते हैं कि यहाँ के लोग बहुधा हिंदी बोलते समय संज्ञाओं के लिए ग़लत लिंग का प्रयोग करते हैं। ये अंतर अकस्मात नहीं उत्पन्न हुए। वास्तव में वे संस्कृति में भेद के प्रतीक हैं। आर्य और द्रविडियाई संस्कृतियों के पार एक और भारतीय संस्कृति है। इसलिए, पूर्व भारत को उतना ही महत्त्व देना चाहिए जितना कि उत्तर और दक्षिण भारत को दिया जाता है।









