December 11, 2025

First published July 13, 2025

 in Dainik Bhaskar

पाबूजी की लोककथा से जानें शूर्पणखा और लक्ष्मण के पुनर्जन्म की कहानी

Pabuji

रामायण में शूर्पणखा की कहानी के बारे में अधिकांश लोग जानते हैं। शूर्पणखा राक्षसों के राजा, रावण की बहन थी और जंगल में स्वतंत्र जीवन जीती थी। एक दिन वह राम से मिली, जिनका वनवास चल रहा था। उनकी सुंदरता से मोहित होकर शूर्पणखा ने उनसे विवाह करने की मांग की। लेकिन विवाहित होने के कारण राम ने शूर्पणखा का प्रस्ताव नकारा और उसे अपने अनुज, लक्ष्मण से मिलने कहा। लक्ष्मण ने भी शूर्पणखा को ठुकराया क्योंकि अपने बड़े भाई और अपनी भाभी की सेवा करना उनका एकमात्र उद्देश्य था।

शूर्पणखा चिढ़ गई कि राम और लक्ष्मण दोनों ने उसे ठुकराया था। इसलिए, उसने सीता पर हमला किया। लेकिन इससे पहले कि सीता को कोई चोट पहुंच सकें, लक्ष्मण ने उसे रोककर वहाँ से बालों से घसीटते हुए लेकर गए। फिर उन्होंने शूर्पणखा को शिक्षा देने के लिए अपनी तलवार से उसकी नाक कांट दी। शूर्पणखा राम और लक्ष्मण की शिक़ायत करने रावण के पास चिल्लाती हुई पहुंची। रावण वह जानकर क्रोधित हुए और अपनी बहन पर हुए वार का प्रतिशोध करने के लिए उन्होंने सीता का अपहरण कर उन्हें लंका में बंदी बनाया। अंत में राम ने लंका पर आक्रमण किया और रावण का वध करके सीता को मुक्त किया।

राजस्थानी लोक रामायणों के अनुसार रावण का वध करने के लिए यह आवश्यक था कि राम उनकी आत्मा को मुक्त करें। यह आत्मा सूर्य-देव के रथ को खींचने वाले एक अश्व के नथुने में बंद थी। लेकिन केवल एक ब्रह्मचारी यह कर सकता था। इन लोक रामायणों में लक्ष्मण की पत्नी, उर्मिला की बात नहीं की गई है, जिन्हें वे अयोध्या में छोड़ आए थे। इसलिए, इन कथनों के अनुसार लक्ष्मण ने इस अश्व के नथुने में बाण मारा। ऐसा करने से रावण की आत्मा मुक्त हुई और राम उनका वध कर पाए। अन्य कथनों में राम ने नहीं बल्कि लक्ष्मण ने रावण का वध किया। इससे उन कथनों पर जैन धर्म का प्रभाव दिखाई देता है, जिसके अनुसार राम परिपूर्ण होने के कारण अहिंसक थे।

राजस्थान के भोपा समुदाय के लोग, जो नायक जाति के घुमक्कड़ चारण हैं, मानते हैं कि चूँकि लक्ष्मण ने रावण का वध किया था, इसलिए यह तय हुआ कि किसी अगले जन्म में उनका रावण के हाथों वध होता। उनके अनुसार हालाँकि इस अगले जन्म में शूर्पणखा लक्ष्मण की पत्नी बनती, लक्ष्मण कभी शूर्पणखा के पति नहीं बनते। लक्ष्मण का यह अगला जन्म पाबूजी के महाकाव्य में वर्णित है। इस लोक-देवता की कथा का सदियों से मौखिक प्रसार होता आ रहा है और आज उसका विलुप्त होने का डर है। यह मौखिक परंपरा कम से कम 600 वर्ष पुरानी है। इसकी तुलना में रामायण को उससे बहुत पहले, अर्थात आज से 2000 वर्ष पहले लिखित रूप दिया गया।

पाबूजी को समर्पित एकमात्र पुण्यस्थान रेगिस्तान में कोलू नामक छोटेसे गांव में स्थित है। यहाँ रबारी समुदाय के पशुपालक उन्हें पूजते हैं। संभवतः इस खानाबदोश समुदाय को स्थायी मंदिर आवश्यक नहीं लगा हो। मंदिर की जगह फड़ नामक चित्रित, लपेटा हुआ कपड़ा होता है, जो भोपा समुदाय के चारण अपने साथ रखते हैं। ये चारण रात में फड़ को खोलकर दीए से चित्रों पर रौशनी डालते हैं और गीत गाकर चित्रों को विस्तारपूर्वक वर्णित करते हैं। इस प्रकार, गीतों के माध्यम से ये वीर-देवता और गायों के रक्षक खिल उठते हैं।

भोपा निचली जाति का अनपढ़ चारण है जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पूर्वजों से ये गीत सीखते आया है। बहुधा उसकी पत्नी या बहन भी उसके साथ गीत गाती हैं। भोपा गाते समय केवल अपना रावणहत्था बजाता है। कहते हैं कि रावण ने यह वाद्य शिव के सम्मान में बनाया था – इस वीणा की डंडी अपनी भुजा से और उसकी तारें अपनी स्नायुओं से।

पाबूजी की लोककथा के अनुसार रावण ने जिंदराव खींची, शूर्पणखा ने राजकुमारी फूलवती, जबकि लक्ष्मण ने पाबूजी बनकर पुनर्जन्म लिया।

पाबूजी के पिता, धांधल राठौड़ की उनकी पत्नी के साथ दो संतानें थी, एक पुत्र बुरो और एक पुत्री पेमा। फिर उन्हें एक अप्सरा पर प्रेम हुआ। उस अप्सरा ने धांधल राठौड़ से इस शर्त पर विवाह किया कि वे उसपर रात में कभी नज़र नहीं रखेंगे। उस अप्सरा के साथ धांधल राठौड़ को पाबूजी और सोना ये दो संतानें हुईं। एक दिन उन्होंने अपना वचन तोड़ा और रात में अप्सरा को शेरनी के रूप में अपने बेटे को दूध पिलाती हुई पाया। जब अप्सरा को यह पता चला तब उसने सदा के लिए धांधल को छोड़ दिया। वह अपनी संतानों को भी उनके पास छोड़ गई। जाते हुए उसने पाबूजी को वचन दिया कि वह कालमी नामक जादुई घोड़ी के रूप में लौटेगी।

अगले सप्ताह के लेख में हम पाबूजी की कहानी जारी रखते हुए जानेंगे कैसे फूलवती से उनका विवाह होते-होते बच गया।


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