आइए पाँच हज़ार वर्षों का सफ़र तय करते हैं सात दिनों में


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आज के लेख के लिए कुछ रोचक करते हैं और वह है भारत के इतिहास को केवल एक सप्ताह में संक्षिप्त करना। हड़प्पा की सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक भारत का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। इसलिए, इस एक सप्ताह का प्रत्येक दिन लगभग 700 वर्षों की अवधि का होगा। आइए देखते हैं प्रत्येक दिन कौनसी घटनाएं घटीं।

रविवार के दिन, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में कृषि की शुरुआत हुई। सिंधु घाटी, गुजरात के समुद्रतट, तथा राजस्थान और हरियाणा में हड़प्पा की सभ्यता का उगम भी इसी दिन हुआ। कांस्य युग की इस सभ्यता के शहर विश्व की अन्य सभ्यताओं के साथ व्यापार के लिए जाने जाते थे। उन्होंने तरह-तरह की वस्तुओं का मध्य-पूर्वी एशिया तक निर्यात किया, जैसे तिल, मुर्गियों, मनकों और कपास का। व्यापार को नियंत्रित करने के लिए मुहरों का प्रयोग किया गया। इन मुहरों पर यूनिकॉर्न की और अन्य प्रतिमाएं होती थी। रविवार को भारत अश्वों से अपरिचित था। यह इसलिए कि अश्व केवल सोमवार को कैस्पियन सागर के निकट पालतू बनाए गए।

सोमवार को, हड़प्पा के शहरों का धीरे-धीरे पतन हुआ। इसके साथ विश्वभर में कांस्य युग का व्यापार जाल भी कमज़ोर होते गया। हालाँकि अश्व इसी दिन पालतू बनाए गए, रथों पर सवार योद्धा विश्वभर मिस्र, यूनान, मध्य-पूर्वी एशिया, चीन और भारत में केवल मंगलवार को देखे गए।

मंगलवार के दिन, यूरेशिया के स्टेपी क्षेत्र से अश्वों पर सवार पुरुषों ने पंजाब में प्रवेश किया। इससे पहले वे कुछ पीढ़ी मध्य एशिया की ऑक्सस सभ्यता में रह चुके थे। पंजाब में स्थानीय महिलाओं से विवाह कर वे वहीं बस गए। उनके वंशजों ने संस्कृत भाषा निर्माण की, जिसके माध्यम से यूरेशिया, ऑक्सस, सिंधु नदी के मैदानों और हड़प्पा की यादें व्यक्त की गईं। अपने पिताओं की तरह इन संतानों ने भी अपने आप को आर्य कहा।

समय के साथ, इन आर्यों ने पंजाब से गंगा तक प्रवास किया। वहाँ की उपजाऊ मिट्टी के कारण और लोहा मिलने के कारण पशुपालन पर आधारित उनकी खानाबदोश जीवन पद्धति कृषि पर आधारित स्थायी जीवन पद्धति में बदल गई। इसी दिन, दक्षिण भारत के पशुपालक समुदाय, जो उत्तर भारत के आर्यों से अलग थे, अपने मृतकों को हांडियों में दफ़न कर रहें थे और उनके सम्मान में विशाल डोलमेन पत्थर तथा राख के ढेर खड़े कर रहें थे।

बुधवार तक, वैदिक संस्कृति गंगा के मैदानों में पनप रही थी। व्यापारी फ़ारस तक गजों और कपास का निर्यात कर रहें थे। व्यापार के लिए कार्षापण नामक मुद्रा का प्रयोग शुरू हो चुका था। इस दिन, सिद्धार्थ गौतम नामक राजकुमार संपत्ति और विलासिता को निरर्थक मानकर बुद्ध बन गया। पुनर्जन्म, ऋण और मुक्ति की धारणाएं भी इसी दिन लोकप्रिय हुईं। सिकंदर ने फ़ारस के साम्राज्य को पराजित किया। उसके पराक्रमों से पाटलिपुत्र के राजाओं को प्रेरणा मिली। बौद्ध और जैन साधु तथा ब्राह्मण पुजारी नर्मदा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदी घाटियों में बसकर वहाँ की संस्कृति में योगदान करने लगें।

गुरुवार के दिन, महाराष्ट्र के सातवाहन राजाओं का वर्चस्व था। उनकी मदद से जैन और बौद्ध व्यापारियों ने मुंबई के पास सोपारा के बंदरगाह से होते हुए आंध्र प्रदेश से रोम तक कपास का निर्यात किया। उत्तर भारत में, महामार्ग यूनानी, शक, पहलव, कुषाण और हुन जैसे विदेशियों के नियंत्रण में थे। उन्होंने बौद्ध विहारों और संस्कृत भाषा को भी बढ़ावा दिया। इसी दिन, दक्षिण भारत में तमिल और प्राकृत भाषाओँ में प्रेमियों और योद्धाओं की विशाल गाथाएं रची जा रहीं थी। वैष्णववाद और शैववाद का भी इसी दिन उगम हुआ।

शुक्रवार के दिन, दक्षिण भारत में चालुक्य, राष्ट्रकूट, चेर, चोल और होयसल तथा पूर्व भारत में पाल और सेन जैसे राज्य पनपें। कन्नड, मराठी, तेलुगु, ओडिआ और बंगाली भाषाएँ भी इसी दिन विकसित हुईं। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य इस अवधि में जीवित रहें। शुक्रवार तक, ब्राह्मण संस्कृति ने बौद्ध और जैन धर्मों पर वर्चस्व पा लिया था। इसके अलावा, भारत में जाति व्यवस्था भी प्रचलित हो चुकी थी।

शनिवार दिल्ली और बहामनी सल्तनतों और राजपूत तथा गजपति राजाओं का समय था। इस दिन, विजयनगर, मुग़ल, मराठा और अंग्रेज़ी साम्राज्य पनपकर उनका पतन हुआ और भक्ति आंदोलन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा। आज़ादी की लड़ाई भी इसी दिन लड़ी गई। यह औद्योगीकरण और लोकतंत्र का काल था।

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